Home » बिहार के मर्चा धान को मिला GI टैग, जानें किसानों का क्या होगा फायदा

बिहार के मर्चा धान को मिला GI टैग, जानें किसानों का क्या होगा फायदा

by Rakesh Pandey
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

बिहार की पहचान कई मशहूर चीजों से है। लिट्टी चोखा से लेकर मखाना तक हर कुछ बिहार की पहचान बन गयी है। अब एक और खुशखबरी है कि बिहार के पश्चिम चंपारण के मर्चा धान को GI टैग मिल गया है और इसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान बन गई है। इसके साथ ही बिहार में जीआई टैग कृषि उत्पादों की संख्या छह हो गई है।

इस सूची में कतरनी चावल, भागलपुरी जर्दालू आम, मगही पान, शाही लीची और मिथिला मखाना पहले से ही शामिल हैं। मर्चा धान के लिए केंद्र सरकार ने जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग दिया है। इससे बिहार के किसानों को मर्चा धान को बेहतर दाम मिलने की संभावना है। यह उपज अब अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध होगा और किसानों के लिए एक नया अवसर मिलेगा।

क्या है मर्चा धान?

बता दें कि मर्चा धान की आकृति अन्य धान से काफी अलग काली मिर्च की तरह होता है। इसलिए इसको मिर्चा या मर्चा धान के नाम से जाना जाता है। धान से निकलने वाले चावल के दाने और गुच्छे में एक खास सुगंध होती है, जो इसे अलग बनाती है। मर्चा धान का पौधा लंबा होता है। ये किस्म बुवाई के 145 से 150 दिनों के अंदर पककर तैयार हो जाती है और 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देता है।

मर्चा धान को मिला टैग

केंद्र सरकार के जीआई रजिस्ट्रार, चेन्नई की ओर से जारी प्रमाण पत्र में शनिवार को समाहरणालय के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में मर्चा धान उत्पादक सहयोग समिति के अधिकारियों और सदस्यों को जीआई टैग प्रमाण पत्र प्रदान किया गया। वहीं, जीआई रजिस्ट्रार ने जिला प्रशासन को भी इसका प्रमाण पत्र प्रेषित किया है, जिसे जिलाधिकारी को समर्पित किया गया। जिलाधिकारी ने बताया कि यह पश्चिम चंपारण जिले के लोगों विशेष रूप से किसानों के लिए गौरव का क्षण है। अब चंपारण की शान मर्चा धान से विश्व स्तर पर इस जिले को पहचान मिल गई। इससे मर्चा धान की खेती में लगे किसानों को उनके उत्पादों के लिए ज्यादा मूल्य मिलेगा। साथ ही आधारित कई उद्योग भी लगेंगे।

पश्चिम चंपारण के इन जगहों पर होता है उत्पादन

जिलाधिकारी दिनेश कुमार राय ने बताया कि मर्चा धान बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में स्थानीय रूप से पाए जाने वाले चावल की एक किस्म है। यह काली मिर्च की तरह दिखाई देता है, इसलिए इसे मिर्चा या मर्चा राइस के नाम से जाना जाता है। उन्होंने बताया कि इसे स्थानीय स्तर पर मिर्चा, मचया, मारीची आदि नामों से भी जाना जाता है।

मिर्च धान के पौधे, अनाज और गुच्छे में एक अनूठी सुगंध होती है, जो इसे अलग बनाती है। इस चावल के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र पश्चिमी चंपारण जिले के चनपटिया, मैनाटांड़, गौनाहा, नरकटियागंज, रामनगर एवं लौरिया है। पश्चिम चंपारण का मर्चाधान अपने स्वाद, पोषक तत्व और प्राकृतिक रूप से एक विशेष क्षेत्र में उत्पादन के लिए मशहूर है। कहावत है कि यदि पैरवी और पैसे से कोई काम नहीं बन रहा हो तो मर्चा धान का चूड़ा उपहार में दे दीजिए काम बन जायेगा।

बिहार के इन उत्पादों को मिला है GI टैग

बिहार में कृषि उत्पादों के साथ-साथ विभिन्न हस्तशिल्प उत्पादों को भी जीआई टैग मिला है। पहले पांच उत्पादों में मुजफ्फरपुर की शाही लीची, भागलपुर का जर्दालु आम, भागलपुर का कतरनी चावल, मिथिला का मखाना और मगध का मगही पान शामिल हैं। अब मर्चा धान भी इस सूची में शामिल हो गया है, जिससे बिहार के कृषि उत्पादों की संख्या पांच से बढ़कर छह हो गई है।

हस्तशिल्प क्षेत्र में बिहार इन उत्पादों को मिला है GI टैग

इसके अलावा, बिहार में हस्तशिल्प क्षेत्र में भी कई उत्पादों को जीआई टैग मिला है, जैसे कि मंजूषा कला, सूजनी कढ़ाई, एप्लिक खटवा वर्क, सिक्की घास के प्रोडक्ट, मधुबनी पेंटिंग, भागलपुरी सिल्क और सिलाव का खाजा। यह जीआई टैग उत्पादकों को उनके काम की पहचान और बेहतर बाजार पहुंच प्रदान करता है। केंद्र सरकार के जीआई रजिस्ट्रार, चेन्नई, ने मर्चा धान के उत्पादक सहयोग समिति के अधिकारियों और सदस्यों को जीआई टैग प्रमाण पत्र प्रदान किया। इस उपलब्धि को मनाने के लिए, एक कार्यक्रम समाहरणालय के सभागार में आयोजित किया गया, जिसमें प्रमाण पत्रों का वितरण किया गया।

Related Articles