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यात्रा वृतांत : दक्षिण भारत की परंपराओं का ‘स्वाद’

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे गए कॉलम : घुमक्कड़ की पाती से साभार

by Sanjaya Shepherd
yatra bedant
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दिल्ली की उस सुबह में एक अलग ही उत्साह था। सर्द हवा के बीच जब मैंने घर का दरवाज़ा बंद किया, तो मन में एक नई यात्रा की हल्की-सी धड़कन महसूस हो रही थी। रोज़मर्रा की भागदौड़ से कुछ समय दूर जाकर भारत की किसी ऐसी जगह को देखने की इच्छा थी, जहां इतिहास और परंपरा आज भी जीवित हों। कई दिनों से मैं दक्षिण भारत के एक खास क्षेत्र के बारे में पढ़ रहा था- चेत्तीनाड। कहा जाता है कि यह स्थान अपनी भव्य हवेलियों, अनोखी वास्तुकला और प्रसिद्ध व्यंजनों के कारण देश-विदेश के यात्रियों को आकर्षित करता है। यही सोचकर मैंने इस यात्रा की योजना बनाई और दिल्ली से चेत्तीनाड की ओर निकल पड़ा।

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नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की चहल-पहल हमेशा की तरह जीवंत थी। प्लेटफॉर्म पर लोगों की भीड़, चाय और कॉफी की खुशबू और ट्रेनों की आवाज़ें मिलकर एक परिचित माहौल बना रही थीं। मैं अपनी सीट पर बैठा और खिड़की से बाहर देखने लगा। जैसे ही ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ी, मुझे लगा कि मैं केवल एक शहर नहीं, बल्कि अपनी थकान और चिंता को भी पीछे छोड़ रहा हूं।

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सफर लंबा था, लेकिन रास्ते के बदलते दृश्य उसे रोचक बना रहे थे। उत्तर भारत के मैदान, खेतों में काम करते किसान और छोटे-छोटे कस्बे एक-एक करके पीछे छूटते जा रहे थे। रात के समय ट्रेन की खिड़की से बाहर दूर-दूर तक फैली रोशनी दिखाई देतीं, जो यात्रा को और भी यादगार बना रही थीं।
करीब दो दिन बाद जब ट्रेन दक्षिण भारत की धरती पर पहुंची तो वातावरण में एक अलग ही गर्मजोशी महसूस हुई। हवा में हल्की नमी थी और आसपास का दृश्य उत्तर भारत से बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा था। स्टेशन से बाहर निकलते ही मैंने देखा कि सड़क के दोनों ओर नारियल के पेड़ कतारबद्ध खड़े हैं और वातावरण में एक शांत सादगी फैली हुई है।


कुछ समय बाद मैं उस क्षेत्र में पहुंचा, जिसे देखने की उत्सुकता मुझे यहां तक खींच लाई थी। चेत्तीनाड की पहली झलक ने ही मेरे मन पर गहरा प्रभाव डाल दिया। चौड़े रास्तों के किनारे खड़ी विशाल हवेलियां दूर से ही अपनी भव्यता का परिचय दे रही थीं। उनके ऊंचे दरवाज़े और मजबूत दीवारें यह बता रही थीं कि कभी यहां समृद्धि और वैभव का अद्भुत संगम रहा होगा।


मैंने सबसे पहले एक पारंपरिक हवेली को देखने का निश्चय किया। जैसे ही मैं उस हवेली के मुख्यद्वार के सामने पहुंचा, उसकी नक्काशीदार बनावट ने मुझे कुछ क्षणों के लिए वहीं रोक दिया। दरवाज़े को पार करते ही अंदर का दृश्य और भी प्रभावशाली दिखाई दिया। विशाल खंभे, जिन पर बारीक कारीगरी की गई थी, उस जगह की शान को और बढ़ा रहे थे। दीवारों पर लगे बड़े शीशे और चमकदार संगमरमर का फर्श इस बात का प्रमाण दे रहे थे कि उस समय के लोग कला और सौंदर्य को कितना महत्व देते थे।

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हवेली के भीतर कदम रखते ही एक विशाल आंगन दिखाई दिया, जहां धूप की किरणें सीधे जमीन पर गिर रही थीं। उस खुले स्थान में खड़े होकर मुझे एक अनोखी शांति का अनुभव हुआ। चारों ओर फैली खामोशी और व्यवस्थित संरचना यह महसूस करा रही थी कि यह जगह केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि एक परंपरा का प्रतीक है।


इसी दौरान मेरी नजर फर्श पर पड़ी और मैं उसकी सुंदरता को देखकर चकित रह गया। रंग-बिरंगी अथंगुडी टाइल्स का आकर्षक पैटर्न पूरे वातावरण को जीवंत बना रहा था। इन टाइल्स की चमक और रंगों का संतुलन इतना सुंदर था कि उन्हें देखकर मन में कारीगरों की मेहनत के प्रति सम्मान पैदा हो गया। जब मैंने उन टाइल्स पर धीरे-धीरे कदम रखा तो उनकी ठंडक ने मुझे तुरंत सुकून का एहसास कराया।

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उस क्षण मुझे यह महसूस हुआ कि मेरी यह यात्रा केवल एक नई जगह देखने तक सीमित नहीं है। यह अनुभव मुझे भारत की कला, परंपरा और जीवनशैली के उस पहलू से परिचित करा रहा था, जिसे अक्सर हम अपनी व्यस्त जिंदगी में नजरअंदाज कर देते हैं। हवेली के उस शांत वातावरण में खड़े होकर मुझे लगा कि इस यात्रा की असली कहानी अभी शुरू ही हुई है और आगे मुझे यहां की संस्कृति, स्वाद और लोगों के जीवन को और करीब से जानने का अवसर मिलने वाला है।


अगले ही दिन सुबह जब सूरज की हल्की किरणें हवेली के आंगन में फैलने लगीं तो मैंने आसपास के जीवन को और करीब से देखने का निश्चय किया। वातावरण में एक शांत लय थी, जैसे हर काम अपने समय पर और बिना किसी हड़बड़ी के हो रहा हो। यह दृश्य मेरे लिए बिल्कुल नया था, क्योंकि दिल्ली जैसे बड़े शहर में जीवन हमेशा तेज़ गति से चलता है।


कुछ देर बाद मुझे स्थानीय भोजन का अनुभव करने का अवसर मिला। एक पारंपरिक घर के आंगन में बैठकर भोजन करने की व्यवस्था की गई थी। जैसे ही मैं वहां पहुंचा, घर की महिलाओं ने मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया। उनकी सादगी और अपनापन इतना सहज था कि मैं तुरंत अपनेपन का एहसास करने लगा। थोड़ी ही देर में मेरे सामने केले का एक ताज़ा पत्ता बिछा दिया गया, जो यहां भोजन परोसने की परंपरागत शैली है।

धीरे-धीरे उस पत्ते पर तरह-तरह के व्यंजन सजने लगे। हर व्यंजन की खुशबू अलग थी और उसका रंग भी आकर्षक दिखाई दे रहा था। जब मैंने पहला कौर चखा तो मुझे महसूस हुआ कि यहां का भोजन केवल स्वाद का नहीं, बल्कि परंपरा का भी अनुभव है। मसालों की सुगंध और उनका संतुलित उपयोग इस क्षेत्र की खास पहचान है।

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भोजन के दौरान मैंने देखा कि यहां खाना बनाना एक कला की तरह माना जाता है। हर व्यंजन में मेहनत और अनुभव की झलक दिखाई देती है। स्थानीय लोग अपने खान-पान को गर्व के साथ प्रस्तुत करते हैं और मेहमानों को परिवार के सदस्य की तरह सम्मान देते हैं। यह अपनापन इस यात्रा का सबसे खास अनुभव बन गया।

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भोजन के बाद मैं आसपास के बाजार की ओर निकल पड़ा। बाजार की गलियों में हल्की-हल्की चहल-पहल थी और हर दुकान पर कुछ नया देखने को मिल रहा था। कहीं मसालों की खुशबू हवा में घुली हुई थी, तो कहीं पारंपरिक वस्तुएं सजी हुई थीं। दुकानदार बड़े उत्साह से अपने सामान के बारे में बताते और ग्राहकों से मुस्कुराकर बातचीत करते नजर आ रहे थे।


मैंने भी अपनी यात्रा की याद के रूप में कुछ चीजें खरीदने का निर्णय लिया। मैंने स्थानीय मसालों का एक छोटा पैकेट लिया, ताकि घर लौटने के बाद भी इस जगह की खुशबू मेरे साथ बनी रहे। इसके अलावा एक छोटा-सा पारंपरिक बर्तन भी खरीदा, जो मुझे हमेशा इस यात्रा की याद दिलाता रहेगा।शाम होने लगी थी और आसमान का रंग धीरे-धीरे बदल रहा था।

सूरज की किरणें पूरे वातावरण को सुनहरी आभा से भर रही थीं। उस शांत दृश्य को देखते हुए मुझे महसूस हुआ कि यह यात्रा केवल एक स्थान देखने की नहीं थी, बल्कि अपने देश की संस्कृति और परंपराओं को समझने की यात्रा थी। अगले दिन जब वापसी का समय आया तो मन में एक हल्की-सी उदासी भी थी और संतोष भी। उदासी इसलिए कि एक सुंदर अनुभव पीछे छूट रहा था और संतोष इसलिए कि इस यात्रा ने मुझे नई यादें और नई समझ दी थी।

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स्टेशन की ओर जाते हुए मैं बार-बार उस शांत वातावरण को देख रहा था, जिसने इतने कम समय में मेरे दिल में एक खास जगह बना ली थी।
दिल्ली लौटते समय ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मेरे मन में यही विचार आ रहा था कि यह यात्रा केवल एक साधारण भ्रमण नहीं थी। यह एक ऐसा अनुभव था, जिसने मुझे भारतीय परंपराओं, कला और स्वाद की गहराई से परिचित कराया। अब जब भी मैं उस यात्रा को याद करता हूँ तो चेत्तीनाड (तमिलनाडु) की सादगी, वहां के लोगों का अपनापन और उस जगह की सुगंध मेरे मन में फिर से जीवंत हो उठती है।

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