
अपने संघर्ष के दिनों में दो दोस्त एक दूसरे से ये वादा करते हैं कि जब वो सफल होंगे तो निर्देशक मित्र अपने अभिनेता मित्र के लिए एक फिल्म बनाएगा और निर्देशित करेगा और अभिनेता मित्र अपने मित्र द्वारा निर्देशित फिल्म में अभिनय करेगा। संघर्षरत अभिनेता मित्र देव आनंद ने निर्देशक बनने को संघर्षरत अपने मित्र गुरु दत्त से किया अपना वादा तब पूरा किया जब उन्होंने उनके द्वारा निर्देशित फिल्म बाज़ी (1951) में अभिनय किया, गुरु दत्त ने अपना वादा आधा पूरा किया और सीआईडी का निर्माण किया पर अपनी व्यस्तताओं के कारण निर्देशक के रूप में उन्होंने मौका दिया अपने सहायक राज खोसला को जिनकी पहली फिल्म मिलाप यूं तो खास सफल न हो सकी थी पर गुरु दत्त को अपने शागिर्द पर भरोसा था। आगे चल कर हिचकॉक शैली से खासे प्रभावित खोसला ने मेरा साया, वो कौन थी और अनीता जैसी कई नामचीन रोमांच फिल्में निर्देशित कीं।
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शहर के मशहूर अखबार बॉम्बे टाइम्स के एडिटर साहब अपनी खबरों से शहर के एक बड़े सफेदपोश को बेनकाब करने वाले होते हैं और उन्हें इसके लिए जान से मारने की धमकियाँ मिल रही होती हैं, वो मदद के लिए सीआईडी ऑफिसर शेखर (देव आनंद) को फोन करते हैं। फोन पर बात होने के बाद जब तक शेखर उनकी मदद को पहुंचता, उस सफेदपोश का गुंडा शेर सिंह (महमूद) वहाँ पहुँच कर एडिटर श्रीवास्तव को चाकू मार देता है और वहाँ से निकल भागता है।
भागते हुए गुंडे का पीछा करते हुए शेखर की मुलाकात रेखा (शकीला) से होती है। उसकी कार से पीछा करता शेखर कातिलों को पकड़ नहीं पाता और वापस लौट कर उसे पता चलता है कि एडिटर श्रीवास्तव मरे नहीं थे पर चाकू के हमले से गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्हें अस्पताल भेज कर वहाँ जांच-पड़ताल में जुटी टीम को एडिटर के ऑफिस में छिपा हुआ मास्टर (जॉनी वॉकर) नाम का एक जेबकतरा मिलता है जिसने हत्या करते हुए शेर सिंह को देखा था। शेखर उस जेबकतरे को पहचानता है और शेखर को देख कर जेबकतरा कातिल को पहचानने की बात कबूल करता है। चरस वाली सिगरेट के सुराग का पीछा करता शेखर शेर सिंह तक पहुँच जाता है और उसे गिरफ्तार भी कर लेता है, मास्टर पुलिस स्टेशन आकर उसकी पहचान भी कर लेता है।
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कहानी आगे बढ़ती है और हमें पता चलता है कि उस दिन जिस रेखा की गाड़ी में सीआईडी ऑफिसर शेखर जबरन घुस गया था वो शेखर के बॉस एसपी माथुर (के एन सिंह) की बेटी है और दोनों में दोस्ती हो जाती है। इधर शेर सिंह को पकड़ने के बाद शेखर को कामिनी (वहीदा रहमान) का फोन आता है और उन्हें वो अपनी गाड़ी भेज कर एक अनजान बंगले पर बुलाती है और उन्हें शेर सिंह को छोड़ने के एवज में पचास हजार रुपये की बड़ी रकम रिश्वत के रूप में देना चाहती है।
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इनकार करने पर शेखर को बॉम्बे पूना हाइवे पर बेहोश कर के छोड़ दिया जाता है। वहाँ से पुलिस की टीम उठा कर उसे एसपी माथुर के घर ले आती है जहां रेखा का जन्मदिन मनाया जा रहा है और कामिनी भी रेखा के दोस्त के रूप में वहाँ आई हुई है। शेखर उसे वहाँ पहचान जाता है। यहीं हमें पता चलता है कि एडिटर श्रीवास्तव की हत्या की योजना बनाने वाला कोई और नहीं, सेठ धर्मदास है जिसकी दरियादिली और नेकनियती के चर्चे पूरे शहर में हैं। पार्टी में धर्मदास को जब कामिनी बताती है कि शायद शेखर ने उसे पहचान लिया है तो वो कामिनी को वहाँ से जल्द चले जाने को कहता है और खुद भी वहाँ से चला जाता है। पचास हजार की रिश्वत के प्रलोभन से इन्स्पेक्टर शेखर को यह विश्वास हो जाता है कि शेर सिंह से हत्या करवाने वाला कोई बड़ा आदमी है। पूछताछ के क्रम में शेर सिंह की पिटाई की जाती है और जब उसे वापस लॉकअप में डाला जाता है तभी वहाँ मौजूद धर्मदास के आदमी शेर सिंह की हत्या कर देते हैं और आरोप इन्स्पेक्टर शेखर पर आ जाता है।
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इन्स्पेक्टर शेखर कैसे इस जाल से बाहर निकलता है और किस तरह धर्मदास को जेल पहुंचाया जाता है, फिल्म के इस हिस्से को दर्शक स्वयं देख कर महसूस करें तो बेहतर है। पर इतना जरूर कहना चाहूँगा कि फिल्म का ये हिस्सा सन् 1950-60 के दशक के हिसाब से काफी तेज है और दर्शकों के थ्रिल में कोई कमी नहीं आती। तेजी से बदलते घटना क्रम, अदाकारों का समर्थ अभिनय और निओ-नॉइर सिनेमा के अन्य तत्व फिल्म को आखिरी मिनट तक रोमांचक बनाए रखते हैं।

आग, आह और नौजवान जैसी फिल्में लिखने वाले इंदर राज आनंद, ने वर्ष 1956 की सबसे बड़ी हिट फिल्म सीआईडी के लिए भी पटकथा और संवाद लिखे, ये संवाद उस दौर में कितने मनोरंजक रहे होंगे इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहीदा रहमान और देव आनंद के बीच का पहला संवाद तोते के बारे मे बात करते करते किया जाता है। इंदर राज आनंद वर्ष 1987 में अपनी मृत्यु से कुछ समय पूर्व तक सक्रिय रहे और उनकी पटकथा से सजी आखिरी फिल्म 1988 में अमिताभ बच्चन अभिनीत ब्लाक-बस्टर फिल्म शहंशाह थी। इंदर राज आनंद के बेटे टीनू आनंद ने फिल्म शहंशाह का निर्देशन किया था।
इस फिल्म में एक गीत ‘आँखों ही आँखों में इशारा हो गया’ जाँनिसार अख्तर ने लिखा था, शेष सभी गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे। एक अमरीकी लोक धुन का गीत, ‘ओ माई डार्लिंग क्लेमेन्टीन’ जब मजरूह ने सुनी तो उस धुन पर उन्होंने तुरंत वहीं ‘ए दिल है मुश्किल जीना यहाँ’ लिख डाला, जिसे बाद में ओपी नैयर ने संगीत से सजा कर कालजयी बना दिया, साल 1956 का बिनाका गीतमाला पर बजने वाला सरताज गीत भी यही था। फिल्म में आशा भोंसले, गीता दत्त, शमशाद बेगम और मोहम्मद रफी ने कर्णप्रिय धुनों को अपनी आवाज दी और शेष गीत भी खासे लोकप्रिय हुए थे।
सीआईडी फिल्म से जुड़े कुछ बड़े नाम फिल्म में अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे लेकिन इन नामों ने आने वाले समय में अपनी प्रतिभा से हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री पर बड़ा प्रभाव डाला।
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महमूद और वहीदा रहमान तो दर्शकों द्वारा फिल्म देखते समय ही पहचान लिए जाते हैं पर छोटे से रोल में टुनटुन भी खासा प्रभावित करती हैं। फिल्म के तकनीकी पक्ष से जुड़े सहायक निर्देशक प्रमोद चक्रवर्ती, भप्पी सोनी और कला निर्देशक बीरेन नाग ने कालांतर में स्वतंत्र निर्देशक के रूप में कुछ बेहतरीन फिल्में निर्देशित कीं। फिल्म में नृत्य निर्देशन जोहरा सहगल का था और फिल्म का कॉस्टयूम भानू अथैया ने डिजाइन किया। भानू अथैया अकैडमी अवॉर्ड पाने वाली पहली भारतीय हैं, वर्ष 1983 में गांधी फिल्म के लिए उन्हें यह सम्मान दिया गया।
फिल्म की बात करें तो फिल्म में कुछ एक कमियाँ भी हैं, निर्देशक यदि चाहते तो धर्मदास के किरदार की पहचान को कुछ अधिक समय के लिए छुपा सकते थे, अगर फिल्म के क्लाइमैक्स में अस्पताल के कमरे में धर्मदास की पहचान उजागर होती तो फिल्म अधिक मजेदार हो सकती थी। सीआईडी, पुलिस, कोर्ट की प्रक्रियाओं की जानकारी का अभाव भी फिल्म में स्पष्ट दिखाई देता है, फिल्म की कोरियोग्राफी यूं तो ठीक है पर वहीदा रहमान जैसी प्रशिक्षित नृत्यांगना के लिए और बेहतर डांस स्टेप डिजाइन किये जा सकते थे।
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फिल्म की गति किसी भी थ्रिलर के लिए आवश्यक रूप से तेज होने जितनी तेज है, संगीत मधुर और कर्णप्रिय हैं, अदाकारों की अदाकारी प्रभावित करती है और जब तक निर्देशक मुख्य खलनायक का चेहरा नहीं दिखाता, तब तक दर्शक यह नहीं जान पाते कि फोन पर कामिनी को निर्देश देने वाला बंदा कौन है।
गुरु दत्त ने अपनी फिल्मों में हारमोनियम बजा कर गाते एक स्ट्रीट सिन्गर जोड़े को सबसे पहले प्रयोग किया। नायक जहां खुद गाना नहीं गाता वहाँ ऐसा एक जोड़ा कहानी को आगे बढ़ाने के काम आता रहा, समुंदर किनारे फिल्माए गए ऐसे गीतों की एक सूची बनाई जाए तो देव आनंद की सीआईडी से लेकर अमिताभ बच्चन की जंजीर तक अनेकों हिट गीतों की एक लिस्ट बनाई जा सकती है। भारतीय खासकर हिन्दी सिनेमा की रहस्य रोमांच श्रेणी की शुरुआती फिल्मों के लिहाज से सीआईडी न सिर्फ बेहतरीन है बल्कि उसने बीरेन नाग, राज खोसला जैसे कई निर्देशकों के विकास की जमीन तैयार की।
यूट्यूब, अमेज़न प्राइम जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सीआईडी अपने रोमांच, कर्णप्रिय और मधुर गीत-संगीत, भावप्रणव अभिनय और बड़े विज़न के लिए जरूर देखी जानी चाहिए।

