
दिल्ली की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में अक्सर ऐसा लगता है कि समय किसी अदृश्य मशीन का पुर्जा बन चुका है। सुबह की मेट्रो, सड़कों पर अनवरत दौड़ती गाड़ियाँ, मोबाइल की घंटियाँ और काम की अंतहीन सूची के बीच मन कई बार किसी ऐसी जगह भाग जाना चाहता है, जहां शोर नहीं, केवल हवा की सरसराहट सुनाई दे; जहां कंक्रीट की दीवारों के बजाय पहाड़ हों और जहां आसमान को देखने के लिए गर्दन उठानी न पड़े, क्योंकि वह हर पल आंखों के सामने खुला रहता हो। ऐसी ही एक बेचैनी ने मुझे भारत के सुदूर उत्तर-पूर्व में बसे नागालैंड की दजुकू वैली की ओर खींच लिया। कहते हैं, धरती पर कुछ स्थान ऐसे होते हैं, जहां पहुंचकर लगता है कि प्रकृति ने अपनी सबसे सुंदर कल्पना वहीं साकार की है। दजुकू वैली उन्हीं दुर्लभ स्थानों में से एक है। दिल्ली से मेरी यात्रा की शुरुआत एक लंबी उड़ान से हुई। विमान ने जैसे ही महानगर की धुंधली छतों को पीछे छोड़ा, मन भी धीरे-धीरे हल्का होने लगा।
कोलकाता होते हुए मैं दीमापुर पहुंचा। हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही मौसम का पहला स्पर्श ही अलग था। हवा में नमी थी, लेकिन उसमें पहाड़ों की एक अनकही ताजगी भी घुली हुई थी। वहां से सड़क मार्ग से कोहिमा की ओर बढ़ते हुए लगा जैसे भारत का एक बिल्कुल नया चेहरा सामने खुल रहा हो। घुमावदार सड़कें, देवदार और चीड़ के वृक्ष, दूर-दूर तक फैले पहाड़ और बीच-बीच में दिखाई देते लकड़ी के घर—सब कुछ किसी चित्रकार की कैनवास पर उकेरी गई दुनिया जैसा लग रहा था।
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कोहिमा पहुंचते-पहुंचते शाम उतर आई थी। पहाड़ी शहर की रोशनियां मानो अँधेरे में बिखरे छोटे-छोटे तारों जैसी चमक रही थीं। रात वहीं बितानी थी, क्योंकि अगली सुबह दजुकू वैली की असली यात्रा शुरू होनी थी। होटल की खिड़की से बाहर झांकते हुए पहाड़ों पर छाए बादलों को देख रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति स्वयं अगले दिन की कहानी का पहला अध्याय लिख रही हो।
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सुबह सूरज पूरी तरह निकला भी नहीं था कि मैं विसवेमा गांव की ओर निकल पड़ा। यही वह स्थान है, जहां से दजुकू वैली का ट्रेक आरंभ होता है। गांव की शांति में पक्षियों की आवाज़ें किसी प्रार्थना जैसी लग रही थीं। स्थानीय युवक, जो हमारा गाइड था, मुस्कराकर बोला—’ऊपर पहुंचने के बाद आपको लगेगा कि आप बादलों के बीच चल रहे हैं’। उस समय यह बात केवल एक सुंदर कल्पना लगी, लेकिन कुछ घंटों बाद वह सच बन चुकी थी।
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ट्रेक का पहला हिस्सा चुनौतीपूर्ण था। पत्थरों से भरी खड़ी चढ़ाई सांसों की परीक्षा ले रही थी। हर मोड़ पर लगता कि अब शायद शिखर आ गया, लेकिन सामने एक और ढलान खड़ी मिलती। शरीर थक रहा था, पर प्रकृति लगातार ऊर्जा दे रही थी। रास्ते में कहीं जंगली ऑर्किड खिले थे, कहीं छोटे-छोटे झरने चट्टानों के बीच से फूटते दिखाई दे रहे थे। हवा इतनी स्वच्छ थी कि हर सांस भीतर तक उतरकर जैसे वर्षों की थकान धो रही थी।
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करीब तीन घंटे बाद अचानक जंगल समाप्त हुआ और सामने जो दृश्य था, उसने मेरे कदम वहीं रोक दिए। मेरे सामने फैली थी—दजुकू वैली। दूर-दूर तक फैली हरी घास, लहरों की तरह उठती-गिरती घाटियां, उनके बीच सांप-सी बलखाती एक पतली नदी और ऊपर बिल्कुल नीला आकाश, जिसमें बादल इतने नीचे थे कि लगता था हाथ बढ़ाकर उन्हें छू लिया जाए। उस क्षण मुझे पहली बार समझ आया कि लोग इस घाटी को धरती का स्वर्ग क्यों कहते हैं।
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जुलाई का महीना दजुकू वैली की आत्मा है। इसी समय यहां प्रसिद्ध दजुकू लिली खिलती है, जो दुनिया में केवल इसी क्षेत्र में पाई जाती है। पूरी घाटी रंग-बिरंगे जंगली फूलों से ढक जाती है। कहीं बैंगनी, कहीं पीले, कहीं सफेद और कहीं गुलाबी फूलों की चादर बिछी थी। हवा जब इन फूलों को छूकर गुजरती, तो पूरा मैदान किसी अदृश्य संगीत की लय में झूम उठता। वहां कोई शोर नहीं था, केवल हवा, घास और पक्षियों का संगीत था।
मैं एक चट्टान पर बैठ गया। सामने बादलों का एक झुंड धीरे-धीरे घाटी में उतर रहा था। कुछ ही मिनटों में पूरा दृश्य धुंध से ढंक गया। ऐसा लगा जैसे प्रकृति ने अचानक सफेद रेशमी चादर ओढ़ ली हो। फिर उतनी ही सहजता से बादल हटे और घाटी फिर से मुस्कराने लगी। वहां मौसम घड़ी देखकर नहीं बदलता, वह अपने मन से आता-जाता है।
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स्थानीय लोगों का प्रकृति से रिश्ता भी अद्भुत है। वे इस घाटी को केवल पर्यटन स्थल नहीं मानते, बल्कि अपनी सांस्कृतिक धरोहर समझते हैं। उनके लिए हर पहाड़ी, हर झरना और हर पेड़ का अपना महत्व है। शायद यही कारण है कि आज भी दजुकू वैली अपनी मूल सुंदरता बचाए हुए है। यहां प्लास्टिक का शोर नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान दिखाई देता है।
घाटी में चलते हुए कई बार ऐसा लगा कि समय रुक गया है। न मोबाइल का नेटवर्क था, न किसी सूचना की बेचैनी। केवल वर्तमान था और उसी में डूबा हुआ मन। शहरों में हम समय को पकड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन यहां समय स्वयं हमारा हाथ पकड़कर धीरे-धीरे चलना सिखाता है। शायद यात्रा का वास्तविक अर्थ भी यही है—अपने भीतर लौट आना।
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दोपहर बाद जब हम घाटी के एक ऊंचे हिस्से तक पहुंचे, तो चारों ओर फैले हरे मैदानों को देखकर मन में एक विचित्र शांति उतर आई। दूर पहाड़ों की कतारें धुंध में खो रही थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो धरती और आकाश का मिलन यहीं कहीं हो रहा हो। उस दृश्य को कैमरे में कैद करने की इच्छा तो हुई, लेकिन तुरंत लगा कि कुछ दृश्य स्मृतियों में ही अधिक सुंदर रहते हैं।
शाम ढलने लगी थी। सूरज की सुनहरी किरणें जब हरी घास पर पड़ीं, तो पूरी घाटी मानो पिघले हुए सोने से चमक उठी। यह दृश्य शब्दों में बाँधना लगभग असंभव है। प्रकृति कभी-कभी इतनी उदार हो जाती है कि मनुष्य केवल मौन होकर उसे निहार सकता है।
वापसी के समय कदम भारी थे। ऐसा नहीं था कि रास्ता कठिन था; कठिनाई इस बात की थी कि उस अद्भुत संसार को पीछे छोड़ना पड़ रहा था। नीचे उतरते हुए बार-बार मुड़कर घाटी को देखता रहा। हर बार वह पहले से अधिक सुंदर दिखाई देती। शायद इसलिए कि विदा के क्षणों में हर सुंदर चीज़ और अधिक प्रिय लगने लगती है। दिल्ली लौटने के बाद भी दजुकू वैली मेरे भीतर से कभी नहीं गई। जब भी महानगर का शोर असहनीय लगता है, आंखें बंद करते ही वही हरी घाटियां, वही बादलों की चादर, वही जंगली फूल और वही नीरव हवा याद आ जाती है। तब लगता है कि प्रकृति केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने की कला भी सिखाती है।
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दजुकू वैली की यात्रा ने मुझे यह एहसास कराया कि संसार की सबसे बड़ी संपत्ति भव्य इमारतें या चमकदार शहर नहीं, बल्कि वे स्थान हैं जहां मनुष्य स्वयं को फिर से खोज लेता है। यदि जीवन की भागदौड़ से कुछ दिनों का विराम लेकर प्रकृति की गोद में बैठना चाहते हैं, यदि बादलों को अपने कंधों के पास से गुजरते देखना चाहते हैं और यदि यह अनुभव करना चाहते हैं कि धरती पर भी स्वर्ग हो सकता है, तो नागालैंड की दजुकू वैली आपका इंतज़ार कर रही है। वहां पहुंचकर शायद आप भी मेरी तरह यही कहेंगे- कुछ यात्राएं पूरी नहीं होतीं, वे जीवन भर हमारे भीतर चलती रहती हैं।
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