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Giridih News : वनकर्मी सीमा विवाद में उलझे थे और गजराज का जारी था आतंक, मान मनव्वल के बाद हाथियों को मिला कोडरमा क्षेत्र में एंट्री

by Kanchan Kumar
Giridih Elephant Herd
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गिरिडीह: रात का घना सन्नाटा, जलती मशालों की लाल-पीली लपटें और कांपती आवाजों के बीच धमकती भारी-भरकम टापों की आवाज… गिरिडीह के बिरनी इलाके में पिछले पांच दिनों से खौफ की ऐसी ही एक दास्तान लिखी जा रही थी। फसलों को रौंदते, घरों की दीवारें ढहाते और एक बेकसूर युवक की जान लेने के बाद जब हाथियों का यह विशाल झुंड आगे बढ़ा, तो आगे सीमा को लेकर एक नया ड्रामा खड़ा हो गया।

​हाथी तो अपने पुराने कुदरती रास्ते यानी पश्चिम दिशा की ओर रुख कर चुके थे, जहां सामने कोडरमा जिले की सीमा और पपीलो का घना जंगल था। मगर हद तो तब हो गई जब कोडरमा के वनकर्मियों ने हाथियों को अपने इलाके में घुसने से रोकने के लिए नाकाबंदी कर दी। रास्ता बंद देख भटके हुए हाथियों की टोली बार-बार पलटकर गांवों पर टूट पड़ती। चानो और मुरैना जैसे गांवों में मंगलवार की पूरी रात दहशत के साये में गुज़री। ग्रामीण हाथों में मशालें थामे ढोल-नगाड़े बजाते रहे और बेकाबू हाथी खेतों में लहलहाती फसलें रौंदते रहे।

कोडरमा की टीम ने कर रखी थी नाकाबंदी

​इसी बीच सरहद पर इंसानों की अपनी एक जंग चल रही थी। एक तरफ गिरिडीह के वनकर्मी थे जो हाथियों को सुरक्षित जंगल में खदेड़ना चाहते थे, तो दूसरी तरफ कोडरमा की टीम उन्हें अपनी सीमा में नहीं आने देना चाहती थी। मंगलवार की पूरी ढलती रात से लेकर बुधवार के तड़के तक दोनों जिलों की वन विभाग टीमों के बीच तीखी बहस और कहासुनी होती रही। ​आखिरकार बुधवार सुबह आपसी मान-मनौव्वल के बाद रास्ता खुला। गिरिडीह की टीम ने राहत की सांस ली जब झुंड आखिरकार कोडरमा के पपीलो जंगल की गहराई में ओझल हो गया।

दूर नहीं हुआ है डर

​सीमा पर गिरिडीह के वनकर्मी अब भी पहरा दे रहे हैं ताकि झुंड पलटकर न आ जाए, पर ग्रामीणों की आंखों से डर ओझल नहीं हुआ है। कमलकांत, मनोज और रोहित जैसे स्थानीय ग्रामीणों के चेहर चेहरे पर चिंता साफ दिखती है। उनका कहना है कि वन विभाग की स्पेशल टीमें पीछे तो चलती हैं, लेकिन उनके पास संसाधनों की भारी कमी है। अक्सर देखा गया है कि हाथी खदेड़े जाने के महज छह घंटे बाद ही उसी रास्ते वापस लौट आते हैं।

​फिलहाल, राख में तब्दील हो चुकी मशालें और रौंदे हुए खेत इस बात की गवाही दे रहे हैं कि जंगल और इंसान के बीच का यह संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। गांव वाले अब भी सहमे खड़े हैं।

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