
फीचर डेस्क : भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाने वाली श्रीकृष्ण जन्माष्टमी इस वर्ष 4 सितंबर को मनाई जाएगी। इस अवसर पर देशभर में घरों और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की झांकियां सजाई जाती हैं और उनके जन्म का उत्सव श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। जन्माष्टमी से जुड़ी सबसे लोकप्रिय परंपराओं में दही हांडी उत्सव भी शामिल है। विशेष रूप से महाराष्ट्र और मुंबई सहित कई राज्यों में यह आयोजन बड़े स्तर पर किया जाता है। ऊंचाई पर बांधी गई दही की मटकी को तोड़ने के लिए युवक और युवतियां मानव पिरामिड बनाते हैं। इस परंपरा में भाग लेने वाले समूहों को गोविंदा दल भी कहा जाता है। लेकिन जन्माष्टमी के अवसर पर दही हांडी फोड़ने की परंपरा क्यों निभाई जाती है और इसका भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से क्या संबंध है? इस उत्सव के पीछे धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं से जुड़ी एक रोचक कहानी प्रचलित है।
जन्माष्टमी पर दही हांडी क्यों फोड़ी जाती है
दही हांडी की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप और उनकी माखन चोरी की लीलाओं से जुड़ी मानी जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बाल्यकाल में भगवान श्रीकृष्ण को माखन और दही अत्यंत प्रिय थे। वह अपने सखाओं के साथ मिलकर गोपियों के घरों में रखे माखन और दही तक पहुंचने का प्रयास करते थे। इसी कारण भगवान श्रीकृष्ण को प्रेम से माखन चोर भी कहा जाता है। कन्हैया की शरारतों से परेशान गोपियां दही और माखन से भरी मटकियों को ऊंचाई पर लटकाकर रखने लगीं, ताकि श्रीकृष्ण और उनके सखा वहां तक आसानी से न पहुंच सकें।
मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ मिलकर एक-दूसरे के कंधों पर चढ़ते थे और ऊंचाई पर रखी मटकी तक पहुंच जाते थे। इसके बाद मटकी में रखा माखन और दही सभी सखाओं के साथ बांटकर खाते थे। दही हांडी उत्सव में इसी बाल लीला को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाता है।
दही हांडी उत्सव और भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला का संबंध
जन्माष्टमी पर आयोजित दही हांडी केवल मटकी फोड़ने का आयोजन नहीं माना जाता, बल्कि यह भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की स्मृति से जुड़ी परंपरा है। मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर लटकी मटकी तक पहुंचने की प्रक्रिया श्रीकृष्ण और उनके सखाओं के सामूहिक प्रयास का प्रतीक मानी जाती है।
धार्मिक मान्यताओं में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन विभिन्न पुराणों और कृष्ण भक्ति साहित्य में मिलता है। माखन, दही और गोपियों के घरों से जुड़ी कथाएं विशेष रूप से कृष्ण के बाल स्वरूप के साथ लोकप्रिय रही हैं। दही हांडी के आयोजन में शामिल मटकी में दही, माखन, मिठाइयां और अन्य प्रसाद रखे जाने की परंपरा है। मटकी टूटने के बाद उसमें रखा प्रसाद श्रद्धालुओं के बीच वितरित किया जाता है।
जन्माष्टमी के अगले दिन कैसे मनाया जाता है दही हांडी उत्सव?
कई स्थानों पर दही हांडी का आयोजन जन्माष्टमी के अगले दिन किया जाता है। इस दिन किसी ऊंचे स्थान पर मिट्टी की मटकी बांधी जाती है। मटकी को इस प्रकार लटकाया जाता है कि उसे तोड़ने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता पड़े। मटकी तक पहुंचने के लिए प्रतिभागी एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव पिरामिड बनाते हैं। पिरामिड के सबसे ऊपर पहुंचने वाला प्रतिभागी मटकी फोड़ने का प्रयास करता है।
इस आयोजन में ढोल-नगाड़े, भजन, कीर्तन और भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों के बीच बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। कई स्थानों पर दही हांडी प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है और अलग-अलग गोविंदा दल मटकी तक पहुंचने का प्रयास करते हैं।
दही हांडी उत्सव की शुरुआत कब और कहां हुई?
दही हांडी की परंपरा का धार्मिक संबंध भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जोड़ा जाता है, जबकि इसके आधुनिक सार्वजनिक उत्सव के रूप में विकास को लेकर अलग-अलग स्थानीय मान्यताएं और विवरण मिलते हैं।
कुछ प्रचलित मान्यताओं के अनुसार महाराष्ट्र क्षेत्र में बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में दही हांडी के सार्वजनिक आयोजन को व्यापक स्वरूप मिला। नवी मुंबई के घनसोली गांव में वर्ष 1907 में इस प्रकार के आयोजन की शुरुआत होने से संबंधित मान्यता भी प्रचलित है। इसके बाद यह उत्सव मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में लोकप्रिय होता गया।
समय के साथ दही हांडी का आयोजन महाराष्ट्र की सीमाओं से बाहर निकलकर देश के विभिन्न राज्यों तक पहुंच गया। आज जन्माष्टमी के अवसर पर कई शहरों और कस्बों में दही हांडी के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
Janmashtami 2026 में दही हांडी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
दही हांडी उत्सव भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, सामूहिक प्रयास और कृष्ण भक्ति से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा के रूप में मनाया जाता है। मानव पिरामिड बनाने में कई लोगों का एक-दूसरे पर भरोसा और तालमेल आवश्यक होता है, इसलिए यह आयोजन सामूहिकता का भी प्रतीक माना जाता है।
जन्माष्टमी 2026 के अवसर पर 4 सितंबर को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। इसके साथ देश के विभिन्न हिस्सों में कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी झांकियां, पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और दही हांडी जैसे पारंपरिक आयोजन किए जाएंगे।
इस प्रकार दही की मटकी फोड़ने की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के बालपन से जुड़ी माखन और दही की कथाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है। सदियों से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं के साथ यह उत्सव आज भारतीय संस्कृति के प्रमुख जन्माष्टमी आयोजनों में शामिल हो चुका है।

