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Jharkhand Assembly Elections :  घाटशिला सीट पर JMM के रामदास सोरेन लगायेंगे जीत की तिकड़ी या भाजपा पलटेगी बाजी

रामदास सोरेन, जो पहले भी 2009 और 2019 में इस सीट पर जीत दर्ज कर चुके हैं, इस बार जीत की हैट्रिक बनाने की रणनीति में जुटे हैं।

by Rakesh Pandey
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घाटशिला : अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित घाटशिला विधानसभा सीट पर इस बार फिर राजनीतिक पारा गरम है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने यहां अपने पुराने और अनुभवी उम्मीदवार रामदास सोरेन को मैदान में उतारा है, जबकि भाजपा ने हमेशा की तरह इस सीट को अपने चुनावी प्रयोगशाला के रूप में देखते हुए एक नए चेहरे, बाबूलाल सोरेन को टिकट दिया है। रामदास सोरेन, जो पहले भी 2009 और 2019 में इस सीट पर जीत दर्ज कर चुके हैं, इस बार जीत की हैट्रिक बनाने की रणनीति में जुटे हैं।

राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो इस बार के चुनाव में घाटशिला की जनता को एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना है। झामुमो का एकजुट और मजबूत संगठन रामदास सोरेन की स्थिति को मजबूत कर रहा है, वहीं भाजपा को अपने आंतरिक विरोधों को दूर करते हुए एकजुटता स्थापित करनी होगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या रामदास सोरेन तीसरी बार इस सीट पर जीत का परचम लहरा पाएंगे, या बाबूलाल सोरेन इस असंतोष के माहौल में भी भाजपा का कमल खिला पाएंगे?

झामुमो की एकजुटता और आक्रामक प्रचार अभियान


झामुमो इस बार घाटशिला में एकजुटता के साथ मजबूती से खड़ा है। पार्टी के कार्यकर्ता गांव-गांव में जाकर प्रचार अभियान चला रहे हैं और रामदास सोरेन के समर्थन में मतदाताओं से संवाद कर रहे हैं। झामुमो समर्थकों की इस एकजुटता और सक्रियता से पार्टी के पक्ष में माहौल बनता दिखाई दे रहा है। रामदास सोरेन का अनुभव और जमीनी पकड़ उन्हें घाटशिला में एक मजबूत दावेदार बनाती है, और झामुमो कार्यकर्ताओं का यह जोरदार अभियान उनकी स्थिति को और मजबूत करता दिख रहा है।

भाजपा में अंतर्कलह और असंतोष का माहौल


दूसरी ओर, भाजपा ने इस बार हाल ही में झामुमो छोड़कर आए युवा नेता बाबूलाल सोरेन पर दांव लगाया है। हालांकि, बाबूलाल सोरेन का भाजपा में शामिल होना और उन्हें टिकट मिलना पार्टी के भीतर खलबली मचा चुका है। पूर्व विधायक लक्ष्मण टुडू ने इस फैसले से नाखुश होकर भाजपा छोड़ दी, और अनुसूचित जनजाति मोर्चा के जिलाध्यक्ष रामदेव हेमब्रम ने निर्दलीय के रूप में नामांकन भर दिया। इससे भाजपा के लिए चुनौती और बढ़ गई है, क्योंकि रामदेव का स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ना भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगा सकता है।

इसके अलावा, भाजपा के पूर्व प्रत्याशी लखन मार्डी और डॉ. सुनीता देबदूत सोरेन ने भी बाबूलाल सोरेन को टिकट मिलने पर निराशा जताई। ये दोनों नेता नामांकन सभा में भी उपस्थित नहीं थे, जो भाजपा के भीतर असंतोष को दर्शाता है। हालांकि, नामांकन के दूसरे दिन लखन मार्डी ने अपना जन्मदिन भाजपा जिला कमेटी के साथ मिलकर मनाया, जो कि समर्थकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है और इसे भाजपा में एकजुटता के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, जिलापरिषद सदस्य सुभाष सिंह और पूर्व जिलापरिषद सदस्य सह भाजपा जिला मंत्री गीता मुर्मू पार्टी के फैसले का समर्थन करते हुए प्रचार अभियान में जुट गए हैं।

भाजपा के लिए चुनौतियां और राह की मुश्किलें


घाटशिला में भाजपा को इस बार कई आंतरिक विरोधों का सामना करना पड़ रहा है, जो उसके लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। पार्टी में टिकट को लेकर चल रही खींचतान ने भाजपा के संगठन में दरार पैदा कर दी है, जिससे चुनावी एकजुटता पर असर पड़ रहा है। बाबूलाल सोरेन के लिए इस असंतोष के बीच समर्थन जुटाना और भाजपा को संगठित रखना किसी चुनौती से कम नहीं है।

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