
Jharkhand Bureaucracy : गुरु की कद्र यूं ही नहीं होती। उनके पास हर सवाल का जवाब होता है, जवाब के पीछे की असली कहानी भी। कुछ दिनों से नौकरशाही के गलियारे में चर्चा के केंद्र में ‘गुरु’ हैं। हर शख्स यह जानना चाहता है कि आखिर वह कौन है? जिसे सबकी कारगुजारी पता है। गुरु भी इस नजाकत भरे हालात को समझ रहे हैं। सो, थोड़े सहमे-सहमे थे। राजधानी के एक बड़े क्लब में मिलना-जुलना हुआ। गेट से अंदर आते देखकर खुद ही पास बुला लिया। कहा, चलो कहीं किनारे बैठते हैं। यहां बड़ी आवाजाही है। बस एक शब्द ने बातचीत के लिए प्लेटफॉर्म तैयार कर दिया।
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लिहाजा बिना देर किए गुरु से सीधे प्रश्न दाग दिया, ‘सुना है आजकल बीमारी के इलाज में जाति देखी जा रही है। तीमारदारी वाले महकमे में राजधानी वाली कुर्सी के लिए योग्य उम्मीदवार का फैसला इसी आधार पर हुआ है।’ गुरु मुस्कुराए, बोले- तुम अब भी कुछ मामलों में अनभिज्ञ हो। नियम तो किताबों में होते हैं। कुर्सी पर कौन बैठेगा, यह हर बार ‘कर्म’ के धरातल पर तय होता है। प्रतिप्रश्न किया, ‘लेकिन योग्यता, ईमानदारी, कर्तव्य निष्ठा?’ गुरु ने चश्मा उतारकर किनारे रखा, कहा, ‘यह सब भी महत्वपूर्ण है, बस प्राथमिकताओं में कभी-कभी पिछड़ जाते हैं।’
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ये कहानी यहीं से शुरू होती है…।
गुरु ने बिना किसी लाग-लपेट के बताया कि राजधानी के सेहत वाले महकमे में सबसे अहम कुर्सी पर तैनाती में बस ‘बड़े साहब’ की चली। अब यह पसंद किस वजह से बनी, इसकी अलग-अलग व्याख्या है। नौकरशाही की चौपाल में एक धड़ा इसे आने वाले दिनों में बनने वाले रिश्ते से जोड़कर देख रहा है। दूसरा जिले की समानता-असमानता के चश्मे से परख रहा है। तीसरे को इसमें जातीय समीकरण दिखाई दे रहा है। चौथे का दावा है कि मामला सिर्फ और सिर्फ निजी पसंद और भरोसे का है। यानी एक कुर्सी और उसके चार-पांच कारण। गुरु ने बताया, ‘हकीकत में यही प्रशासनिक कला है।
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एक निर्णय को चाहे जितने चश्मे से देखें, अलग-अलग कहानियां निकलेंगी।’ ‘तो फिर इनमें असली कारण किसे माना जाए?’ गुरु इस सवाल पर हंस पड़े, कहा-‘असली कारण जानने के लिए तुमने गलत जगह प्रश्न पूछा है। नौकरशाही के शब्दों में कारण वही होता है, जो आदेश में लिखा होता है। बाकी सब ‘चर्चा’ होती है।’ अब इस तैनाती को लेकर एक और दिलचस्प तथ्य सुनो। जिन साहब को कमान सौंपी गई, उनके कारनामे जग जाहिर हैं। ऐसे में साफ है कि छोटे साहब का कोई बड़ा मुरीद निर्णायक मंडल में बैठा था।
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हकीकत यह है कि जब कुर्सी आवंटन के पीछे निजी लाभ, संभावित रिश्तेदारी, जिला और जाति जैसे शब्द घूमने लगें, तो प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या सरकारी पदों पर तैनाती भी सामाजिक गणित की प्रयोगशाला है? गुरु को थोड़ा और छेड़ा, पूछा- ‘लेकिन अगर किसी अधिकारी की निजी इच्छा व्यवस्था को प्रभावित करे तो?’ गुरु थोड़े गंभीर हुए। कहा, ‘तब सवाल सिर्फ तैनात अधिकारी का नहीं होता। उस कार्यप्रणाली का होता है, जहां योग्यता और ईमानदारी को दरकिनार कर सिस्टम को पंगु बना दिया जाता है।
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ऐसे में हर तरफ आवाज उठती है। जितने मुंह, उतनी बातें।’ गुरु बोले- याद रखना, अफवाह को हवा चाहिए और तथ्य को कागज। उत्तर सुनकर रहा नहीं गया। पूछा, ‘तो गुरु! इस कहानी का निष्कर्ष?’ गुरु चलते-चलते बोले, ‘अभी निष्कर्ष मत निकालो, सवाल बचाकर रखो, क्योंकि आज के सवाल ही कल की कहानी का आधार बन सकते हैं। यह ऐसी ‘अजेय’ रणभूमि है, जहां कभी कुछ खत्म नहीं होता, युद्ध चलते रहते हैं, बस योद्धा और हालात बदलते हैं।’ सवाल-जवाब का दौर काफी लंबा हो चुका था। शाम ढल चुकी थी। हाथ जोड़कर गुरु ने अपनी राह पकड़ी, हमने अपनी।
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