
रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद स्थित पाथरडीह कोल वाशरी के लिए वर्ष 1960-61 में अधिग्रहित भूमि मूल रैयतों के वारिसों को लौटाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून के अनुरूप हुआ था, प्रभावित लोगों को मुआवजा भी दिया गया था और छह दशक बाद इस प्रक्रिया को चुनौती देने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनके पूर्वजों की करीब 200 एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण पाथरडीह कोल वाशरी के लिए किया गया था, लेकिन उन्हें पर्याप्त मुआवजा, पुनर्वास और नौकरी का लाभ नहीं मिला। उनका यह भी दावा था कि अधिग्रहित भूमि का बड़ा हिस्सा अब तक खाली पड़ा है और बीसीसीएल उसे निजी कंपनी मोनेट इस्पात एंड एनर्जी लिमिटेड को देने की तैयारी कर रही है।
राज्य सरकार और बीसीसीएल ने अदालत को बताया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम की सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए अधिग्रहण किया गया था तथा प्रभावित लोगों को मुआवजा दिया गया था। बीसीसीएल ने यह भी स्पष्ट किया कि जमीन किसी निजी कंपनी को हस्तांतरित नहीं की गई है, बल्कि मोनेट कंपनी को केवल वाशरी के निर्माण, संचालन और रखरखाव का अनुबंध दिया गया था।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि अधिग्रहण विधिसम्मत तरीके से हुआ था और याचिकाकर्ता स्वयं मुआवजा मिलने की बात स्वीकार कर चुके हैं। साथ ही, केवल लगान रसीद के आधार पर स्वामित्व का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए वैध रूप से अधिग्रहित भूमि के मामले को कई दशक बाद दोबारा नहीं खोला जा सकता। इन्हीं आधारों पर याचिका खारिज कर दी गई।


