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Premchand Jayanti LBSM College : ‘प्रेमचंद की प्रासंगिकता’ विषय पर हुई चर्चा, प्रस्तुतियों में जीवंत हुए कथाशिल्पी

जमशेदपुर के लालबहादुर शास्त्री मेमोरियल कॉलेज में महान कथाशिल्पी मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन, विद्यार्थियों, साहित्यकारों ने रखे अपने विचार

by Rakesh Pandey
LBSM College
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जमशेदपुर : यह अवसर प्रेमचंद को जानने-समझने के साथ उनकी रचनाओं को आज के परिप्रेक्ष्य से जुड़ाव महसूस कराने में काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ। महसूस किया गया कि महान कथाशिल्पी प्रेमचंद की रचनाओं की समाज में इतनी गहरी पैठ है जो कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकतीं। जमशेदपुर के एलबीएसएम कॉलेज के सेमिनार हॉल में महान भारतीय कथाकार प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रेमचंद की रचनाओं पर आधारित विद्यार्थियों की प्रस्तुति ने जहां साबित किया कि नई पीढ़ी उनकी रचनाओं के साथ गहरी समझ रखती हैं तो साहित्यकार व शिक्षा जगत से जुड़े लोगों ने अपनी भावनाओं से प्रेमचंद को अभिव्यक्त किया।

खुद रास नहीं आई फिल्मी दुनिया, लेकिन खूब बनीं फिल्में: डॉ. विजय शर्मा

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि डॉ. विजय शर्मा ने कहा कि भले ही प्रेमचंद को फिल्मी दुनिया रास नहीं आई, पर उनके निधन के बाद उनकी कहानियों और उपन्यासों पर फिल्म बनाने का सिलसिला जारी रहा। विश्वप्रसिद्ध भारतीय फिल्मकार सत्यजीत राय जब फिल्म बनाने के लिए हिन्दी में कहानी खोज रहे थे तो उन्होंने प्रेमचंद की ‘सद्गति’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ को चुना।

अपने आप में एक युग थे प्रेमचंद: डॉ. क्षमा त्रिपाठी

अपने संबोधन में साहित्य कला फाउंडेशन की ट्रस्टी डॉ. क्षमा त्रिपाठी ने कहा कि प्रेमचंद केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक युग थे। उनके रचनाओं में जबर्दस्त किस्सागोई है। उन्होंने बहुत सहज भाषा शैली का प्रयोग किया। उनका मानना था कि हिन्दी और उर्दू को अलग नहीं किया जा सकता। उनकी स्त्री-दृष्टि आज भी प्रासंगिक है।

नाट्य प्रस्तुति में जीवंत हुई ‘दो बैलों की कथा’

दो सत्रों में आयोजित कार्यक्रम का पहला सत्र विद्यार्थियों की सृजनात्मकता पर केंद्रित था। सबसे पहले स्नातकोत्तर हिन्दी तृतीय वर्ष की छात्रा पूजा बास्के द्वारा रूपांतरित ‘दो बैलों की कथा’ की नाट्य प्रस्तुति हुई। इसमें हीरा और मोती के रूप में पूजा बास्के और सुमन तांती ने प्रभावशाली अभिनय किया। बैलों के मालिक किसान की भूमिका पिंकी मंडल और उसके साले गया की भूमिका में खुशी मंडल ने अपने अभिनय की छाप छोड़ी। डॉ. सुधीर कुमार ने भी दो छोटी भूमिकाए निभाई। इस नाटक का निर्देशन सामूहिक था। नाट्य रूपांतरण के लिए इसी कहानी का चुनाव क्यों किया गया, यह बताते हुए सुमन तांती ने कहा कि इसमें भूख की पूर्ति,प्राणीमात्र की संवेदना, स्वतंत्रता और सुकून की बात की गयी है, जो हर प्राणी का उद्देश्य होता है।

‘प्रेमचंद के नाम खत’ में झलकी आत्मीयता

कृष्णा साहू ने प्रेमचंद के नाम खत का पाठ किया, जिसमें उनके महत्त्व और प्रासंगिकता को बड़े ही आत्मीय तरीके से व्यक्त किया गया था। शिवम सरदार ने प्रेमचंद की कहानियों से चुने गए उद्धरणों का पाठ किया। इस अवसर पर दीपाली, लक्ष्मी मंडल और फिदा हस्सा पूर्ति ने प्रेमचंद की रचनाओं पर पोस्टर बनाए थे। रिपोर्टियर का कार्य गौरव भक्त ने किया। इस सत्र में भाग लेने वाले सभी कलाकारों और वक्ताओं को प्रो. रितु और डॉ. विनय कुमार गुप्ता ने सम्मानित किया।

प्रेमचंद और उनका साहित्य पहले से अधिक प्रासंगिक: डॉ. अशोक अविचल

दूसरे सत्र में ‘प्रेमचंद की प्रासंगिकता’ विषय पर विचार-विमर्श की अध्यक्षता करते हुए एलबीएसएम कॉलेज के प्राचार्य और हिन्दी-मैथिली के जाने-माने साहित्यकार डॉ. अशोक कुमार झा ‘अविचल’ ने कहा कि प्रेमचंद और उनका साहित्य पहले से अधिक प्रासंगिक है। जिस प्रेम, संवेदना और समतामूलक व्यवस्था की आज भी जरूरत है, उसका सपना और उसके निर्माण की दिशा हमें प्रेमंचद की रचनाओं में मिलती है। विषमतापूर्ण शिक्षा व्यवस्था का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि एक समान शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए। बच्चे कैसे कक्षाओं तक आएं, हमें इस दिशा में गंभीरता से प्रयास करना होगा। वैज्ञानिक चेतना वाला समाज और विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत हम शिक्षा पद्धति और छात्र-युवाओं के माध्यम से ही बना सकते हैं और प्रेमचंद के विचार इसमें सहयोगी हैं।

रचनाओं में जीवन की सार्थकता का संदेश: डॉ. मौसमी

इसके पूर्व विमर्श की शुरुआत करते हुए अंग्रेजी की विभागाध्यक्ष डॉ. मौसमी पॉल ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियां पाठकों को संदेश देती हैं कि जीवन को कैसे सार्थक बनाया जाए। उन्होंने प्रायः गरीबी, स्वतंत्रता संग्राम, पारिवारिक संबंधों की कहानियां ही लिखीं। स्त्रियों के प्रति वे अत्यंत संवेदनशील साहित्यकार हैं। उनका उपन्यास ‘निर्मला’ आज भी पाठकों के हृदय पर असर करता है।

बनी रहेगी प्रेमचंद के न्यायबोध की प्रासंगिकता: डॉ. विनय कुमार

राजनीति विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार गुप्ता ने कहा कि प्रेमचंद जीवित होते तो आज आत्महत्या और दंगों के खिलाफ लिख रहे होते। अपने न्यायबोध के कारण वे हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। दर्शनशास्त्र के विभागाध्यक्ष दीपंजय श्रीवास्तव ने गोदान और गबन जैसे उपन्यासों में व्यक्त जीवन दर्शन की चर्चा की तथा उन पर केंद्रित अपनी कविता सुनाई- कलम उठी तो सत्य लिखा/ जन-जन का हर व्यथित मन लिखा।

अतिथियों को किया गया सम्मानित

आयोजन का आरंभ प्रेमचंद की तस्वीर पर दीप प्रज्ज्वलन और पुष्प अर्पण से हुआ। आयोजन की मुख्य अतिथि प्रसिद्ध लेखिका डॉ. विजय शर्मा और साहित्य कला फाउंडेशन की ट्रस्टी क्षमा त्रिपाठी थीं। इस अवसर पर उन्हें शॉल देकर सम्मानित किया गया। स्वागत वक्तव्य वाणिज्य विभाग के प्रो. बिनोद कुमार ने दिया। धन्यवाद ज्ञापन भूगोल विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार ने किया तथा संचालन हिन्दी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुधीर कुमार ने किया। इस अवसर पर डॉ. सुष्मिता धारा, प्रो. रितु, डॉ. प्रशांत, प्रो. सलोनी रंजने, प्रो. शिप्रा बोयपाई, प्रो. प्रमिला किस्कू, प्रो. बाबूराम सोरेन भी मौजूद थे। प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर मनाया गया यह कार्यक्रम राष्ट्रगान के साथ संपन्न हुआ।

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