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Nirmal Mahato Death Anniversary : शहीद निर्मल महतो की हत्या के बाद तेज हुआ झारखंड आंदोलन, बीरेंद्र सिंह ने मारी थीं तीन गोलियां, जानें निर्मल दा का संघर्ष और इतिहास

by Rakesh Pandey
Nirmal Mahato Death Anniversary
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जमशेदपुर : झारखंड अलग राज्य के आंदोलन में कई लोगों ने अपनी जान गंवाई, लेकिन शहीद निर्मल महतो की हत्या ने इस आंदोलन को ऐसी दिशा दी, जिसने आगे चलकर झारखंड अलग राज्य के गठन की राह मजबूत की। 8 अगस्त 1987 को जमशेदपुर में निर्मल महतो की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उनकी शहादत की बरसी पर हर वर्ष 8 अगस्त को श्रद्धांजलि दी जाती है। शहादत दिवस से एक दिन पहले भी झारखंड आंदोलन में उनके योगदान को याद किया गया।

निर्मल महतो झारखंड आंदोलनकारी होने के साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष और आजसू के संस्थापक नेताओं में शामिल थे। महज 37 वर्ष की उम्र में उनकी हत्या कर दी गई। उनकी मौत के बाद झारखंड को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर आंदोलन और अधिक व्यापक हुआ। झारखंड के साथ बिहार, बंगाल और ओडिशा के वृहद झारखंड क्षेत्र में भी इसका प्रभाव देखने को मिला।

8 अगस्त 1987 को जमशेदपुर में हुई थी निर्मल महतो की हत्या

8 अगस्त 1987 की सुबह जमशेदपुर के बिष्टुपुर थाना क्षेत्र स्थित चमरिया गेस्ट हाउस में निर्मल महतो की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। यह गेस्ट हाउस टाटा स्टील से जुड़ा हुआ है। घटना के समय निर्मल महतो अपने साथी सूरज मंडल के साथ गेस्ट हाउस से बाहर निकल रहे थे।

इसी दौरान एक एंबेसडर कार से पांच लोग वहां पहुंचे। सूरज मंडल को कुछ गड़बड़ होने की आशंका हुई और उन्होंने निर्मल महतो को वापस गेस्ट हाउस के भीतर जाने के लिए कहा। इसी बीच हमलावरों में से एक ने निर्मल महतो का कॉलर पकड़ लिया। सूरज मंडल उन्हें छुड़ाने के लिए आगे बढ़े और निर्मल महतो को हमलावर से अलग भी कर दिया।

इसके बाद भी हमलावरों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। सोनारी निवासी बीरेंद्र सिंह ने निर्मल महतो पर तीन गोलियां चला दीं। एक गोली उनके चेहरे पर, दूसरी पीठ में और तीसरी गोली सीने में लगी। गोली लगने के बाद निर्मल महतो की घटनास्थल पर ही मौत हो गई।

निर्मल महतो की हत्या के बाद पूरे क्षेत्र में भड़का आंदोलन

निर्मल महतो की हत्या की खबर फैलते ही झारखंड आंदोलन ने नया रूप ले लिया। जमशेदपुर से लेकर झारखंड के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। आंदोलन का असर बिहार के साथ बंगाल और ओडिशा के उन क्षेत्रों तक भी पहुंचा, जहां लंबे समय से अलग वृहद झारखंड की मांग उठती रही थी।

निर्मल महतो की हत्या ने अलग राज्य की मांग को व्यापक जनसमर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आंदोलन तेज होने के बाद तत्कालीन बिहार सरकार पर भी राजनीतिक दबाव बढ़ा। आगे चलकर झारखंड के विकास के लिए अलग व्यवस्था और समिति बनाने की दिशा में कदम उठाए गए।

झारखंड अलग राज्य के गठन की मांग कई दशकों से चल रही थी। अनेक आंदोलनकारियों ने इसके लिए संघर्ष किया और कई लोगों ने अपनी जान भी गंवाई। हालांकि, निर्मल महतो की हत्या के बाद आंदोलन की गति और राजनीतिक प्रभाव में बड़ा बदलाव आया।

15 नवंबर 2000 को बना झारखंड अलग राज्य

लंबे राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष के बाद 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल में झारखंड राज्य का गठन हुआ।

इस तरह निर्मल महतो की शहादत के करीब 13 वर्ष बाद अलग राज्य का सपना पूरा हुआ। झारखंड के गठन के इतिहास में निर्मल महतो का नाम आंदोलन के उन प्रमुख नेताओं में लिया जाता है, जिन्होंने राज्य की मांग को जनआंदोलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सीबीआई ने की थी निर्मल महतो हत्याकांड की जांच

निर्मल महतो हत्याकांड की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो ने की थी। हत्या के मामले में आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हुई। हालांकि, हत्या के पीछे की पूरी साजिश का स्पष्ट खुलासा नहीं हो सका। मामले की सुनवाई के दौरान आरोपियों को कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, हाई कोर्ट से भी हत्यारोपियों को जमानत नहीं मिली। हत्याकांड की जांच और न्यायिक प्रक्रिया लंबे समय तक चर्चा में रही।

निर्मल महतो की हत्या के पीछे की कथित साजिश को लेकर झारखंड की राजनीति में समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। हालांकि, हत्या की पूरी साजिश का तथ्यात्मक और अंतिम खुलासा आज भी इस हत्याकांड का महत्वपूर्ण अनसुलझा पहलू माना जाता है।

25 दिसंबर 1950 को हुआ था निर्मल महतो का जन्म

निर्मल महतो का जन्म 25 दिसंबर 1950 को हुआ था। उनके पिता का नाम जगबंधु महतो और माता का नाम प्रियबाला महतो था। वह आठ पुत्रों और एक पुत्री वाले परिवार में दूसरे पुत्र थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा जमशेदपुर के कदमा स्थित टाटा वर्कर्स यूनियन हाई स्कूल में हुई। यहीं से उन्होंने मैट्रिक की शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की।

निर्मल महतो पढ़ाई के साथ परिवार की जिम्मेदारियों में भी योगदान देते थे। वह बच्चों को पढ़ाकर अपनी शिक्षा और परिवार के खर्च में सहयोग करते थे। छात्र जीवन से ही उनकी रुचि सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में बढ़ने लगी थी।

छात्र आंदोलन से झारखंड आंदोलन तक का सफर

निर्मल महतो में बचपन से ही नेतृत्व क्षमता दिखाई देती थी। छात्र जीवन के दौरान ही उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी शुरू कर दी थी। वर्ष 1975 में कुछ असामाजिक तत्वों के साथ हुए संघर्ष के बाद उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई और उन्हें शिक्षा अधूरी छोड़नी पड़ी। इसके बाद उन्होंने छात्र आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। धीरे-धीरे उनका जुड़ाव झारखंड आंदोलन से गहरा होता गया। उन्होंने अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन को मजबूत करने में भूमिका निभाई।

निर्मल महतो ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत झारखंड पार्टी से की थी। बाद में वह झारखंड आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए। उनकी राजनीतिक सक्रियता और संगठन क्षमता ने उन्हें आंदोलन के महत्वपूर्ण नेताओं में स्थापित किया।

निर्मल दा की शहादत आज भी झारखंड आंदोलन का महत्वपूर्ण अध्याय

निर्मल महतो का जीवन झारखंड के अलग राज्य की मांग, छात्र राजनीति और सामाजिक संघर्ष से जुड़ा रहा। उनकी हत्या ने आंदोलन को गहरा आघात दिया, लेकिन इसके बाद अलग राज्य की मांग और अधिक मुखर हो गई।

8 अगस्त को हर वर्ष निर्मल महतो की शहादत को याद किया जाता है। शहीद दिवस के मौके पर राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और झारखंड आंदोलन से जुड़े लोग उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। झारखंड के गठन के इतिहास में निर्मल दा की शहादत को एक ऐसे महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जाता है, जिसने अलग राज्य के आंदोलन को निर्णायक दौर में पहुंचाने में भूमिका निभाई।

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