जमशेदपुर : साहित्य, सिनेमा एवं कला को समर्पित संस्था सृजन संवाद ने इस बार करीम सिटी कॉलेज के मासकॉम विभाग के सहयोग से 160वीं गोष्ठी का आयोजन 26 मार्च 2026 को किया। इसमें मलयालम एवं हिंदी फ़िल्मों में स्त्री की बदलती भूमिका पर चर्चा हुई। वक्ता के रूप में डॉ. एमके पांडेय (दिल्ली) व कालीकट (केरल) से डॉ. महेश थे।
डॉ. विजय शर्मा ने विषय प्रवेश कराते हुए वक्ताओं व दर्शकों-श्रोताओं का स्वागत किया। डॉ. पांडेय ने कुछ ख़ास फ़िल्मों के सहारे स्त्री विषयक दृश्यों की व्याख्या और उनके स्त्री विमर्श के कुछ सूत्रों की तलाश करते हुए ‘देवदास’ जैसी कालजयी फ़िल्म के साथ स्त्री किरदार की अस्मिता और सवाल को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि देवदास को एक ट्रैजिक हीरो और ट्रैजिक प्रेम कहानी के तौर पर व्याख्यायित किया जाता रहा है, जबकि इसके परे भी इससे जुड़े तमाम सवाल हैं। पॉपुलर सिनेमा के साथ यह बात करना जरूरी है, क्योंकि समानांतर सिनेमा में तो यह चिह्न सीधे तौर पर दिखते हैं, समय के साथ बदलते इन चिह्नों को उन्होंने समय-समय पर बनी देवदास फ़िल्म के माध्यम से स्पष्ट किया। ‘देव डी’ आते-आते तक नायिका की छवि और व्यवहार-संवाद पूरी तरह बदल जाते हैं। वह प्रश्न पूछने लगती है, नायक को उसकी औकात दिखाने लगती है। दर्शकों ने उनके संवाद की मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
दूसरे संवादी डॉ. महेश ने पावर प्वॉइंट प्रेजेंटेशन के साथ अपनी बात प्रारंभ की। उन्होंने बताया कि सिनेमा के संदर्भ में इमेज का अर्थ भाषा में अक्षर के समान है। इमेज का गहन संबंध मनोविज्ञान से है। इमेज का अर्थ कैमरे के एंगल से निर्मित विशेष अर्थ में भी रूपायित होता है। उन्होंने मलयालम सिनेमा में इमेज निर्माण की अब तक चली आ रही संरचनाओं का विश्लेषण किया। संकेत एवं संकेतित के आपसी संबंधों को बताया। ‘द ग्रेट इंडियन किचेन’, ‘फ़ेमिनिच्चि फ़ातिमा’, ‘पेण्णुम पोराट्टुम’ एवं ‘हर’ आदि मलयालम सिनेमा में स्त्री-केंद्रित सशक्त इमेज निर्माण की सफ़लता को अपनी स्लाइड्स में दिखाया। मेहनत से तैयार की पीपीटी की दर्शकों ने सराहना की। डॉ. महेश का हिंदी बोलना सबको अच्छा लगा।
सार्थक चर्चा का समापन करते हुए डॉ. विजय शर्मा ने कहा कि इस संवाद का नतीजा है कि इन फ़िल्मों को अगर देखा हुआ है तो भी दोबारा देखने की इच्छा जाग्रत होती है, न देखी हुई फ़िल्मों को देखने की उत्सुकता जगती है। यह गोष्ठी सिनेमा को देखने की एक महत्वपूर्ण दिशा देती है।
अप्रैल में होने वाली 161वीं गोष्ठी घुम्मकड़ी से संबंधित होगी, इस घोषणा के साथ सृजन संवाद की 160वीं गोष्ठी संपन्न हुई।
कार्यक्रम का संचालन लखनऊ से डॉ. मंजुला मुरारी व धन्यवाद ज्ञापन डॉ. विजय शर्मा ने किया।
इनकी भी रही उपस्थिति
फ़ेसबुक लाइव के माध्यम से जमशेदपुर से डॉ. मीनू रावत, डॉ. नेहा तिवारी, डॉ. क्षमा त्रिपाठी, डॉ. ऋचा द्विवेदी, अर्चना अनुपम, वैभव मणि त्रिपाठी, अरविंद तिवारी, गोरखपुर से अनुराग रंजन, गुजरात से डॉ. उमा सिंह, बेंगलुरु से पत्रकार अनघा मारीषा, परमानंद रमण, दिल्ली से आशीष कुमार सिंह, रक्षा गीता, डॉ. एमके पांडेय, वर्धा से अमरेंद्र कुमार शर्मा, पुणे से मनमोहन चड्ढा, केरल से प्रमोद कोवप्रात, भोपाल से उर्मिला शिरीष, ऑस्ट्रेलिया से अनीता बरार आदि दर्शक-श्रोता के रूप में जुड़े। इनके प्रश्नों एवं टिप्पणियों से कार्यक्रम अधिक सफ़ल हुआ। गोरखपुर से अनुराग रंजन ने स्ट्रीमयार्ड संचालन किया।
रंगमंच व फिल्मों के गहन अध्येता हैं डॉ. एमके पांडेय
डॉ. मंजुला मुरारी ने बताया कि सत्यवती कॉलेज, दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, (दिल्ली विश्वविद्यालय) डॉ. एमके पांडेय मुख्य रूप से नाटक, रंगमंच, फ़िल्म पर शोध एवं लेखन किया है। उनके लेख विभिन्न पतर-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। घुमक्कड़ी, अध्ययन, रंगमंच और सिनेमा में गहरी रुचि रखने वाले पांडेय ब्लॉगर हैं और उन्होंने ढ़ेर सारे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सेमान में भाग लिया है। उन्हें हिन्दी प्रतिभा सम्मान, सारस्वत सम्मान, प्रथम महाराजा फ़तेहबहादुर शाही साहित्य आदि सम्मान प्राप्त हैं। देश के कई कला एवं फ़िल्म फ़ेस्टिवल से संबद्ध इन्होंने फ़िल्म में अभिनय भी किया है।
कोविड काल में डॉ. महेश ने लिखा था अविस्मरणीय गीत
डॉ. मंजुला मुरारी ने बताया कि डॉ. महेश कालीकट विश्वविद्यालय में शिक्षण करते हैं, वे कई अन्य कॉलेज में गेस्ट लेक्चरर हैं। उनके कई शोध प्रपत्र विभिन्न शोध जर्नल में प्रकाशित हैं। उन्होंने कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन, संचालन किया है, कई में शोध पत्र प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने कोविड काल में जागरुक करने वाला गीत, ‘अतिथि देवो भव- जीतेंगे हम’ गीत लिखा जिसे केरल सरकार ने अभिनेता मोहनलाल के हाथों रिलीज कराया। मलयालम फ़िल्म के जानकार आज अपनी बात इमेज के अर्थ-संदर्भों को समझाते हुए इमेज, इमेजिंग, इमेजरी, इमेजिनेशन आदि के संदर्भ में मलयालम सिनेमा में ‘मेल गेज’ तोड़ती फ़िल्मों के उदाहरण रखे।
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