

मुंबई : 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि विस्फोट में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल में बम रखा गया था। यह फैसला 17 साल के लंबे इंतजार के बाद आया है और इसके दूरगामी कानूनी तथा राजनीतिक परिणाम होने की संभावना है।

सबूतों के अभाव में बरी हुए आरोपी
विशेष एनआईए अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यद्यपि यह सिद्ध हुआ कि मालेगांव में विस्फोट हुआ था, लेकिन अभियोजन पक्ष यह स्थापित नहीं कर सका कि उस विशेष मोटरसाइकिल में बम रखा गया था। अदालत ने यह भी नोट किया कि घायलों की उम्र के संबंध में कुछ मेडिकल सर्टिफिकेट में हेराफेरी की गई थी, जिसमें उनकी उम्र 101 के बजाय 95 साल बताई गई थी। इस मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, पूर्व भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और सेवानिवृत्त मेजर रमेश उपाध्याय सहित कुल सात व्यक्ति मुकदमे का सामना कर रहे थे। ये सभी आरोपी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोपों का सामना कर रहे थे और फिलहाल जमानत पर बाहर थे।

एक दशक लंबी कानूनी लड़ाई और जांच की प्रक्रिया
29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील शहर मालेगांव में रमजान के पवित्र महीने के दौरान और नवरात्रि से ठीक पहले हुए इस विस्फोट में छह लोगों की जान चली गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। प्रारंभिक जांच महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) ने की थी। हालांकि, 2011 में यह जांच NIA को सौंप दी गई। NIA ने 2016 में अपर्याप्त सबूतों का हवाला देते हुए प्रज्ञा सिंह ठाकुर और कई अन्य आरोपियों को बरी करते हुए एक आरोप पत्र दायर किया था।

एक दशक लंबे मुकदमे के दौरान, अभियोजन पक्ष ने 323 गवाहों से पूछताछ की, जिनमें से 34 अपने बयानों से पलट गए। अदालत ने अप्रैल में सुनवाई पूरी होने के बाद 19 अप्रैल को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अदालत ने बताया कि मामले की विशाल प्रकृति को देखते हुए, जिसमें एक लाख से अधिक पृष्ठों के साक्ष्य और दस्तावेज शामिल हैं, फैसला सुनाने से पहले सभी रिकॉर्डों को देखने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता थी। फैसले के दिन सभी आरोपियों को अदालत में उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया था, इसके साथ ही चेतावनी दी गई थी कि अनुपस्थित रहने वाले किसी भी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
वकील का बयान और न्याय की उम्मीद
आरोपी सुधाकर धर द्विवेदी के वकील रंजीत सांगले ने फैसले से पहले विश्वास व्यक्त किया था कि न्याय मिलेगा। उन्होंने कहा था, ’17 साल की लंबी देरी के बाद, 323 गवाहों के बयानों, 40 गवाहों के मुकरने, 40 महत्वपूर्ण गवाहों के बयान रद्द होने और 40 अन्य गवाहों की जान जाने के बाद आज न्याय होगा। अदालत न्याय करेगी। हमारे खिलाफ कोई सबूत नहीं था। सभी आरोपी बरी हो जाएंगे’। यह फैसला भारतीय न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।
