Ranchi : रांची सिविल कोर्ट ने करीब 17 साल पुराने एक बहुचर्चित नक्सल और मुठभेड़ मामले में बुधवार को अहम फैसला सुनाया है। अपर न्यायायुक्त शैलेंद्र कुमार की अदालत ने कुख्यात नक्सली कुंदन पाहन उर्फ विकास जी और राम मोहन सिंह मुंडा को सबूतों के अभाव में सभी आरोपों से बरी कर दिया।
यह मामला बुंडू थाना कांड संख्या 18/2009 से जुड़ा है। दोनों आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता, आर्म्स एक्ट, सीएलए एक्ट और यूएपीए जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज था। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।
मामले के अनुसार, 5 फरवरी 2009 की रात पुलिस को सूचना मिली थी कि बुंडू थाना क्षेत्र में नक्सली हथियारों के साथ मौजूद हैं। इसके बाद सर्च ऑपरेशन और मुठभेड़ का दावा किया गया। पुलिस ने भारी गोलीबारी और हथियार बरामदगी की बात कही थी। हालांकि, दोनों आरोपी वर्ष 2017 से न्यायिक हिरासत में थे।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष सिर्फ एक गवाह पेश कर सका, जो तत्कालीन बुंडू थाना प्रभारी थे और वही इस केस के सूचक भी थे। अदालत ने कहा कि इतने गंभीर मामले में न तो कोई स्वतंत्र गवाह पेश किया गया और न ही अन्य पुलिसकर्मियों की गवाही कराई गई। वर्षों तक समन और वारंट जारी होने के बावजूद गवाह अदालत में हाजिर नहीं हुए।
अदालत ने यह भी पाया कि आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी को लेकर गंभीर संदेह है। सूचक गवाह ने जिरह में स्वीकार किया कि उन्होंने न तो आरोपियों को घटनास्थल पर देखा था और न ही उनकी गिरफ्तारी में शामिल थे। दोनों आरोपियों को उन्होंने पहली बार अदालत में ही देखा।
पुलिस द्वारा मुठभेड़ में सैकड़ों राउंड फायरिंग का दावा किया गया था, लेकिन जांच में घटनास्थल से एक भी खोखा बरामद नहीं हुआ। कथित जब्त हथियार और कारतूस न तो मौके पर सील किए गए और न ही अदालत में सही ढंग से प्रस्तुत किए जा सके। खून या खून लगी मिट्टी की बरामदगी का भी कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।
इन सभी गंभीर खामियों को देखते हुए अदालत ने कुंदन पाहन उर्फ विकास जी और राम मोहन सिंह मुंडा को आईपीसी की धारा 147, 148, 353/149, 307/149, आर्म्स एक्ट, सीएलए एक्ट और यूएपीए की धारा 13 सहित सभी आरोपों से बरी कर दिया। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता ईश्वर दयाल किशोर ने पक्ष रखा।
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