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भारत में अफगानिस्तान का दूतावास होगा बंद, जानें कारण

by Rakesh Pandey
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सेंट्रल डेस्क: अफगानिस्तान द्वारा भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित अपने दूतावास को बंद करने की खबर सामने आ रही हैं। फिल्हाल भारतीय मीडिया में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है । भारत इसकी पड़ताल कर रहा है। जानकारी के मुताबिक तालिबान के अफगानिस्तान सरकार में आने के बाद दोनों देश के संबंध में अच्छी थे। मगर इसी बीच तालिबान ने भारत में अपने दुतावास को बंद करने की बात कही है।

दिल्ली में स्थित हैं दूतावास

अफगानिस्तान ने हाल में एक बड़ा फैसला लिया है। अपने दूतावास को भारत में बंद करने का निर्णय लिया है। आफगानिस्तान का दूतावास दिल्ली में है, जिसे बंद किया जा रहा है। इसे लेकर भारत के विदेश मंत्रालय को भी सूचित किया गया है। अफगानिस्तान का यह फैसला थोड़ा हैरान करने वाला है, क्योंकि तालिबान के सत्ता में आने के बाद भी दोनों देश के बीच संबंध मेंकोई दरार नही आई थी। हालांकि इसके पीछे की वजह जानने की कोशिश भारत सरकार द्वारा जारी हैं। भारत द्वारा इसे लेकर विशेष जांच भी चल रही है।

क्या है कारण लगाया जा रहा पता

दूतावास बंद करने को लेकर अफगानिस्तान व भारत दोनों देशों ने किसी भी कारण को सार्वजनिक नही किया है ।

लेकिन मौजूदा जानकारी के अनुसार भारतीय विदेश मंत्रालय से पर्याप्त मदद नहीं मिलने के कारण अफगानिस्तान ने दिल्ली में अपना दूतावास बंद करने का फैसला लिया है।

वहीं दूसरी वजह यह भी बतायी जा रही है, कि भारत में अफगानिस्तान के राजदूत फरीद मामुन्दजई, को तालिबान ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने नियुक्त किया था।

इस कारण अफगानिस्तान की तालिबान सरकार से भी दिल्ली के दूतावास को मदद नहीं मिल रही थी। इसके साथ आफगान सरकार भी दूतावास पर दवाब बना रहा था। जिसके कारण फरीद मामुन्दजई ने लैटर लिखकर दूतावास में कार्य बंद करने की जानकारी दी। रिपोर्ट के अनुसार राजदूत ने देश छोड़ दिया है।

क्या है तालिबान

वर्तमान में अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन है, तालिबान का अपना इतिहास है। तालिबान एक पश्तो शब्‍द है। इसका अर्थ होता छात्र। ऐसे छात्र, जो इस्लामिक कट्टरवाद से पूरी तरह से प्रेरित हों।तालिबान या तालेबान के नाम से भी जाना जाता है, एक सुन्नी इस्लामिक आधारवादी आन्दोलन है,जिसकी शुरूआत 1994 में दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में हुई थी। इसकी सदस्यता पाकिस्तान तथा अफ़ग़ानिस्तान के मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को मिलती है।

कहा जाता है कि 1990 के दशक में जब अफगानिस्‍तान से सोवियत संघ की सेना वापस जा रही थी तो कई गुटों में झड़प हुआ। इस झड़प ने अफगानिस्‍तान में तालिबान को जन्‍म दिया।इन गुटों से छुटकारा पाने के लिए अफगान के लोगों ने तालिबान का स्वागत किया। हालांकि बाद में तालिबान के नियमों से परेशान हुए जिसकी वजह से वो इसका विरोध करने लगे, लेकिन तब तक तालिबान इतना मजबूत हो चुका था कि उनके विरोध का इस पर असर नही पड़ा।
वर्ष 1996 से लेकर 2001 तक अफगानिस्तान में तालिबानी शासन के दौरान मुल्ला उमर देश का सर्वोच्च धार्मिक नेता था। उसने खुद को हेड ऑफ सुप्रीम काउंसिल घोषित कर रखा था। तालेबान आन्दोलन को सिर्फ पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने ही मान्यता दे रखी थी। कुछ समय के लिए यह संगठन सत्ता से बेदखल हुआ। इसके बाद दोबारा लंबे संघर्ष के बाद फिर सत्ता में काबिज हो गया।

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अफगानिस्तान में तालिबान का मौजूदा शासन

2 वर्ष पहले लंबे समय से छिड़ी जंग के बाद बाद 15 अगस्त 2021 को भारत की आजादी के दिन अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हो गया।

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