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Mahayogi Gorakhpur University : आयुर्वेद और बायोटेक्नोलॉजी : चिकित्सा के क्षेत्र में हो रहा वैश्विक नवाचार

by Anand Mishra
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  • महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आगाज
  • नई वैश्विक चुनौतियों को संकल्पों के साथ स्वीकार करना होगा : प्रो. डीपी सिंह
  • प्रो. सुभाष चंद्र लखोटिया लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और प्रो. रमेश शर्मा डीएस पाउले ओरेशन अवार्ड से हुए सम्मानित
  • कुलसचिव डॉ. प्रदीप कुमार राव के महाकुंभ पुस्तक और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शोध संदर्भ पुस्तिका का हुआ विमोचन

गोरखपुर : महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, गोरखपुर (एमजीयूजी) के संबद्ध स्वास्थ्य विज्ञान संकाय के तत्वावधान में सोसाइटी फॉर बायोटेक्नोलॉजिस्ट इंडिया (एसबीटीआई) के सहयोग से ‘आयुर्वेद एवं बायोमेडिकल विज्ञान में जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग’ विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत रविवार को हुई। इस सम्मेलन में देश-विदेश के वैज्ञानिक, शोधकर्ता और विशेषज्ञ शामिल हुए।

आयुर्वेद और जैव प्रौद्योगिकी से चिकित्सा में नवाचार: प्रो. भार्गव

राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के अध्यक्ष और पद्मश्री प्रो. बलराम भार्गव ने उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि आयुर्वेद और बायोटेक्नोलॉजी के समन्वय से चिकित्सा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर क्रांतिकारी परिवर्तन हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद की प्राचीन वैदिक चिकित्सा पद्धति और जैव चिकित्सा विज्ञान के समावेश से स्वास्थ्य सेवाओं में नया आयाम जुड़ा है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में जैव प्रौद्योगिकी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यह न केवल स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में सुधार कर रही है, बल्कि आयुर्वेद के सिद्धांतों के साथ मिलकर नई चिकित्सा संभावनाओं का द्वार भी खोल रही है। आयुर्वेद संपूर्ण स्वास्थ्य को दृष्टिगत रखते हुए प्राकृतिक उपचारों पर बल देता है, वहीं जैव प्रौद्योगिकी जीवों और उनके घटकों के माध्यम से उन्नत चिकित्सा उत्पादों के विकास को बढ़ावा देती है।

प्रो. भार्गव ने युवाओं से आह्वान किया कि जैसे भारत ने कृषि, दुग्ध उत्पादन, आईटी, मोबाइल, हेल्थकेयर और अंतरिक्ष विज्ञान में अग्रणी भूमिका निभाई है, वैसे ही अब जैव प्रौद्योगिकी और आयुर्वेद को भी वैश्विक ऊंचाइयों तक पहुंचाने का समय आ गया है। उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान भारत द्वारा विकसित स्वदेशी वैक्सीन का उदाहरण देते हुए कहा कि यह देश की वैज्ञानिक क्षमता और नवाचार की शक्ति को दर्शाता है।

भारतीय ज्ञान परंपरा और चिकित्सा में नवाचार: प्रो. डीपी सिंह

सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे प्रो. डीपी सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा संस्कार और राष्ट्र सेवा की भावना को जागृत करती है। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में स्वास्थ्य सेवा में प्राचीन आयुर्वेद, यूनानी चिकित्सा पद्धति और जैव प्रौद्योगिकी के मेल से नवाचार की नई संभावनाएं उत्पन्न हुई हैं।

प्रो. सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय चिकित्सा पद्धति को आधुनिक शोधों के साथ जोड़कर उसे समृद्ध किया जाना चाहिए। बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नए शोध, नवाचार और सृजन से चिकित्सा में अद्वितीय कार्य किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन जैव प्रौद्योगिकी, चिकित्सा और आयुर्वेद के संभावनाओं की खोज के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करेगा।

वैज्ञानिक रुझानों और नवाचारों को समझने का अवसर: प्रो. सुरिंदर सिंह

महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) सुरिंदर सिंह ने कहा कि यह सम्मेलन शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों को वैज्ञानिक रुझानों और नवाचारों को समझने तथा आपसी संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करेगा।

इस अवसर पर अतिथियों ने महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. प्रदीप कुमार राव द्वारा लिखित महाकुंभ पर केंद्रित पुस्तक और प्रो. सुनील कुमार सिंह द्वारा संपादित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शोध संदर्भ पुस्तिका का विमोचन किया। महायोगी गुरु गोरखनाथ आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के रामचंद्र रेड्डी ने इन पुस्तकों के सार को विस्तार से व्याख्यायित किया।

आयुर्वेद के प्रभावी पहलुओं को अपनाने की जरूरत: प्रो. सुभाष चंद्र लखोटिया

सम्मेलन के पहले तकनीकी सत्र से पूर्व मुख्य उद्बोधन में प्रो. सुभाष चंद्र लखोटिया ने आयुर्वेद एवं जैव विज्ञान के अंतर्संबंधों पर मार्गदर्शन किया। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद को वैज्ञानिक पद्धति से सत्यापित कर उसके प्रभावी पहलुओं को अपनाना चाहिए।

उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने के लिए एक समावेशी और निष्पक्ष दृष्टि अपनाने की आवश्यकता है। इस अवसर पर शोधार्थियों और विशेषज्ञों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए और जैव प्रौद्योगिकी में उभरते अवसरों पर विस्तृत चर्चा की।

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