Patna (Bihar) : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आगामी विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सियासी मैदान में बड़ी चाल चली है। उन्होंने एक के बाद एक कई आयोगों का गठन करके राजनीतिक पंडितों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब तक कुल छह आयोगों की घोषणा की जा चुकी है, जिनमें प्रमुख रूप से मछुआरा आयोग, महादलित आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, सवर्ण आयोग और अल्पसंख्यक आयोग शामिल हैं। राजनीतिक गलियारों में इन फैसलों को नीतीश कुमार की सोची-समझी रणनीति और वोट बैंक को मजबूत करने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।
मछुआरा आयोग : मुकेश सहनी के वोट बैंक पर नजर?
मछुआरा समुदाय में अच्छी पकड़ रखने वाले वीआईपी (विकासशील इंसान पार्टी) के मुखिया मुकेश सहनी के वोट बैंक को अपने पाले में लाने के प्रयास के रूप में मछुआरा आयोग के गठन को देखा जा रहा है। ललन कुमार
को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है। अजीत चौधरी को उपाध्यक्ष तथा विद्यासागर निषाद, रेनू सिंह व राजकुमार को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है।
महादलित आयोग: दलित सियासत में पैठ की कोशिश
महादलित आयोग का गठन अनुसूचित जाति वर्ग के भीतर महादलित समुदाय को सशक्त करने और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की एक महत्वपूर्ण रणनीति मानी जा रही है। इस आयोग का अध्यक्ष मनोज कुमार को बनाया गया है। जबकि राजेंद्र राम, रामेश्वर रजक और रामनरेश राम को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है।
अनुसूचित जाति आयोग: जातीय समीकरणों को साधने का प्रयास
अनुसूचित जाति आयोग में उपाध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति जातीय संतुलन को बनाए रखने की दिशा में एक कदम है। इसमें देवेंद्र कुमार को उपाध्यक्ष और अजय कुमार व रूबेल रविदास को सदस्य बनाया गया है।
अल्पसंख्यक आयोग : मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की रणनीति
अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं को आकर्षित करने के उद्देश्य से अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन के रूप में गुलाम रसूल बलियावी की नियुक्ति को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सवर्ण आयोग: अगड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश
सवर्ण आयोग का गठन उन अगड़ी जातियों को साधने की स्पष्ट रणनीति को दर्शाता है, जिन्हें आमतौर पर भाजपा का मुख्य वोट बैंक माना जाता है। इस आयोग के अध्यक्ष महाचंद्र प्रसाद सिंह बनाए गये हैं।
इन फैसलों का क्या है महत्व?
नीतीश कुमार के इन फैसलों को उनकी व्यापक सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा माना जा रहा है। इसके जरिए वे एक साथ पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, दलित समुदाय, महादलित समुदाय, अल्पसंख्यक समुदाय और सवर्ण जातियों को साधने की कोशिश कर रहे हैं। इससे पहले भी मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक स्तर पर कई बड़े बदलाव किए थे और विभिन्न योजनाओं की घोषणा की थी, जिससे उनकी चुनावी तैयारियों की झलक मिलती है।
मास्टरस्ट्रोक या वाकई जनहित में हैं ये फैसले?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन आयोगों का गठन और उनमें नेताओं की नियुक्ति निश्चित रूप से जनता को प्रतिनिधित्व देने का एक तरीका है। हालांकि, इसके साथ ही यह सत्ता के समीकरणों को अपने पक्ष में करने का एक प्रयास भी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश कुमार की यह रणनीति आगामी चुनाव में कितना कारगर साबित होती है।

