पॉलिटिकल डेस्क : बिहार में जातीय गणना को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसे लेकर लगातार सियासत हो रही है। इस मुद्दे को लेकर बीजेपी पर राजेडी और जदयू हमलावार है। एक तरफ केंद्र सरकार का कहना है कि जातीय जनगणना राज्य का अधिकार नहीं है। यह केंद्र के अधिकार क्षेत्र में होता है। वहीं दूसरी तरफ आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव का कहना है कि बीजेपी और संघ गरीब विरोधी है। दोनों मिलकर दलित और शोषितों की आवाज को दबाना चाहते हैं। गरीबों की आवाज को दबाना चाहती हैं।

जातीय जनगणना पर चल रहे सियासत को लेकर सोमवार को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया था। केंद्र सरकार द्वारा दायर हलफनामा में
जनगणना अधिनियम 1948 का उल्लेख किया गया था। जिसके तहत किसी भी राज्य को जनगणना करने का अधिकार नहीं है। वहीं गृह मंत्रालय बताया ने भी बताया कि राज्य सरकार के पास जनगणना का अधिकार नहीं है। केंद्र के पास यह केंद्रीय अनुसूची के सातवें शेड्यूल में 69 क्रम के तहत अधिकार मिला है।
पहले को लिया वापस, केंद्र सरकार ने दाखिल किया दूसरा हलफनामा
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बिहार में जातिगत सर्वे को लेकर दायर किया हुआ हलफनामा वापस ले लिया। क्योंकि इस हलफनामा के पैरा 5 में लिखा था कि सेंसस एक्ट 1948 के तहत केंद्र के अलावा किसी और सरकार को जनगणना करने का अधिकार नहीं है। बाद में केंद्र सरकार ने दूसरा हलफनामा दायर किया और बताया कि पहले हलफनामा में पैरा 5 को अनजाने में शामिल हो गया था। केंद्र के नए हलफनामे के अनुसार राज्य जातीय जनगणना के बदले जातिगत सर्वे करा सकती है।
क्या कहा था बिहार सरकार ने?
बिहार सरकार पहले भी यह कह चुकी है कि राज्य सरकार जातिगत जनगणना नहीं बल्कि सर्वे कर रही है। इससे पहले 21 अगस्त को इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। जिसमें केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखा था। कोर्ट की सुनवाई जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस भट्टी सुनवाई कर रहे थे। बाद में इस मामले की 28 अगस्त को तय की गई।
कब शुरू हुई थी जातीय गणना?
बिहार में जातीय गणना इसी साल 7 जनवरी से शुरू हुआ था। वहीं जातीय गणना का दूसरा फेज 15 अप्रैल से शुरू हुआ। इसी बीच जातीय गणना को रोकने के लिए यह मामला 21 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल को इस मामले को पटना हाईकोर्ट में जाने को कहा। इस बीच पक्ष-विपक्ष की सियासत भी खूब हो रही थी। हाईकोर्ट ने इस मामले 2 और 3 मई को सुनवाई की। इसके बाद फैसला सुरक्षित रखा। हाईकोर्ट ने 4 मई का अपने फैसला सुनाया। जिसमें बिहार में जातीय गणना पर रोक लगा दी और अगली सुनवाई 3 जुलाई को रखा।
जल्द सुनवाई पूरी करने से हाई कोर्ट ने किया था इनकार
हालांकि बिहार सरकार इस मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने की कोर्ट में अपील की। बिहार सरकार की अपील पर कोर्ट में 9 मई को सुनवाई हुई, जिसपर हाइकोर्ट ने जल्द सुनवाई करने से इंकार कर दिया। हाइकोर्ट ने जल्द सुनवाई नहीं करने पर बिहार सरकार 11 मई को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किया। इसके बाद एक बार फिर से 19 मई को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को हाई कोर्ट जाने को कहा। इसके बाद 3 से 7 जुलाई तक इस मामले पर हाईकोर्ट में बहस हुई। कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
एक अगस्त को जातीय गणना पर हटाई गई रोक
इसके बाद 1 अगस्त को पटना हाईकोर्ट ने जातीय गणना पर रोक हटा दी, उसके बाद बिहार में जाति जनगणना फिर से शुरू हो गई। 3 अगस्त को हाईकोर्ट के जाति जनगणना के अनुमति दिये जाने के खिलाफ केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट पहुंची। जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक नहीं लगाई, कोर्ट ने अगला सुनवाई 14 अगस्त को रखी। 18 अगस्त को बिहार सरकार ने अपना पक्ष कोर्ट में रखा और कहा कि जातीय सर्वे काम पूरा हो चुका है।
अन्य राज्यों में भी हो चुकी है जातीय गणना
इसके बाद केंद्र सरकार की ओर से 21 अगस्त को सॉलीसिटर जनरल ने इस मामले पर अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा। जातीय गणना इससे पहले भी कुछ राज्यों में हो चुकी है, जैसे राजस्थान और कर्नाटक में ऐसी जातीय गणना पहले ही हो चुकी है। हालांकि इसकी रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

