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Gorakhpur Literary Festival : “सृजन के संशय” सत्र में बोले साहित्यकार यतीश कुमार- अनुभव और कल्पना के बीच तैरता है लेखक

कहानी लिखने में लेखक को डरना नहीं चाहिए। हम में से हर कोई किसी न किसी कहानी का पात्र है। कहानियां चारों ओर फैली हैं। मेरी ऑफिस पॉलिटिक्स को ले कर एक कहानी संग्रह है। जिसमें हल्के फुल्के क्षणों को बारीकी से एक शक्ल दी गई है।

by Anurag Ranjan
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गोरखपुर : दो दिवसीय गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल के दूसरे दिन साहित्यिक सत्र “सृजन के संशय” में चर्चित लेखिका प्रियंका ओम, साहित्यकार विनीता अस्थाना, लेखक एवं साहित्यकार यतीश कुमार और साहित्यकार अर्पण कुमार ने अपने विचार रखें। इस दौरान साहित्यकार यतीश कुमार ने कहा कि अनुभव और कल्पना के बीच लेखक तैरता है। इन दोनों के बीच संतुलन हर रचना में अलग होता है।

उन्होंने कहा कि कहानियों का परिवेश हमारे अंदर रहता है। उसको घटना बना कर लिखना साहित्यकार का काम है। सच्ची घटनाओं में लेखक को तटस्थ रहना होता है जिसमें सृजन का स्कोप कम होता है। संपादक के पास जब कहानी जब जाती है, उस समय का संशय सबसे अधिक होता है। कहानियों के गढ़े जाने में संपादक की गंभीरता भी बहुत मायने रखती है। किसी रचना में संशय तब तक विद्यमान रहता है जब तक वह रचना पूरी होने के बाद पाठकों के हाथ तक न पहुंच जाए।

अनुभवों को रचता है कहानीकार : प्रियंका ओम

अपनी रचनाओं से साहित्य जगत में अलग मुकाम हासिल करने वाली लेखिका प्रियंका ओम ने कहा कि कहानीकार अपने अनुभवों को ही रचता है। मेरी कहानियां मेरे अनुभवों के इर्द-गिर्द हैं। कोई भी कहानीकार जब लिखता है तो उसमें काल्पनिकता स्वाभाविक है। भाषा, शिल्प एवं काल्पनिकता की मिलावट साहित्य में आवश्यक है। ज्यों का त्यों लिख देना ही साहित्य नहीं बल्कि उसमें नयापन ले आना कहानी को सुदृढ़ बनाता है। मैं अपनी कहानियों को ले कर आश्वस्त रहती हूं। अपनी कहानियों में किसी और का कहा नहीं सुनती हूं और ये एरोगेंस नहीं, चॉइस है।

लेखक को कहानी लिखते वक्त खुद को देखना चाहिए : विनीता अस्थाना

देश की प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में काम करते हुए मीडिया जगत में अपना लोहा मनवाने के बाद लेखन और शिक्षण के क्षेत्र में भी अपनी लोहा मनवा रही विनीता अस्थाना ने कहा कि मेरे सृजन में पत्रकार होने का संशय सदैव रहता है। शुरुआती कहानियों में मुझे लगा कि मैं खबर लिख रही हूं। उसको सुधार कर के ही मैने उपन्यास बनाया। तब ‘बेहया’ लिखी गई। मैने उपन्यास लिखते-लिखते सीखा न कि सीख के लिखा। यदि आप मेरी कहानी को बेहतर करते हैं तो मैं इसके लिए ओपन हूं, लेकिन छेड़छाड़ बिल्कुल स्वीकार नहीं करती। कहानी को बेहतर बनाने का स्वागत है लेकिन मात्र हस्तक्षेप के लिए नहीं। लेखक को अपनी कहानी लिखते समय सबसे पहले खुद को देखना होता है न कि दूसरों को।

कहानी लिखते वक्त लेखक को डरना नहीं चाहिए: अर्पण कुमार

लेखक अर्पण कुमार ने कहा कि साहित्य समाज के किसी भी क्षेत्र से अछूता नहीं रह सकता है। कहानी लिखने में लेखक को डरना नहीं चाहिए। हम में से हर कोई किसी न किसी कहानी का पात्र है। कहानियां चारों ओर फैली हैं। मेरी ऑफिस पॉलिटिक्स को ले कर एक कहानी संग्रह है। जिसमें हल्के फुल्के क्षणों को बारीकी से एक शक्ल दी गई है। आप इस रचना में देखेंगे कि किस प्रकार ये कहानियां हमें अपनी लगती हैं। लेखक की जीत यही है जब पाठक उसमें स्वयं को महसूस करे। पाठक जब कहानियों में अपने जीवन की कहानी पाता है तो वह कथानक से संबंध स्थापित करता है।

इस सत्र के अतिथियों का सम्मान डॉ. ज्ञानेश नंदन लाल, अमित सिंह पटेल, डॉ० संदीप कुमार श्रीवास्तव, कुमार आनंद, DGM स्टेट बैंक और नितिन जायसवाल। सत्र का मॉडरेशन वैभव मणि त्रिपाठी ने किया। आभार ज्ञापन अनूप पांडेय ने किया।

डॉ. क्षमा त्रिपाठी की किताब का कवर हुआ लांच

समकालीन स्त्री विमर्श और उषा प्रियंवदा के उपन्यास पर आलोचना आधारित डॉ. क्षमा त्रिपाठी लिखित किताब का कवर लांच गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल के दूसरे दिन किया गया। इसका प्रकाशन सर्व भाषा ट्रस्ट ने किया है। हिंदी से एमए और पीएचडी डॉ. क्षमा त्रिपाठी साहित्य, पेंटिंग और पत्रकारिता में सक्रिय हैं।

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