Jharkhand Bureaucracy : गुरु की महफिल में जोर-जोर से हंसी के फव्वारे छूट रहे थे। आवाज घर के दरवाजे तक आ रही थी। आगे बढ़ा तो ड्राइंग रूम में पूरी सभा मौजूद थी। गुरु एक-एक कर नौकरशाही की परतें उधेड़ रहे थे। मंडली में शामिल जनता लहलोट हुई जा रही थी।
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सभा में एक और शिष्य आते देख गुरु अंदर से आह्लादित हो गए। पास पड़ी कुर्सी की ओर इशारा करते हुए बैठने को कहा। मुखारविंद से प्रवचन जारी रखा। बोले- वनांचल की नौकरशाही की सबसे बड़ी विडंबना है कि यह संवाद शून्य हो गई है। गुरु की यह भूमिका पल्ले नहीं पड़ी।
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ललाट की सिकुड़न देख गुरु भाव समझ गए। कहा- कहने का मतलब यह है कि अधिकारियों ने आपसी बातचीत लगभग बंद कर दी है। एक-दूसरे के प्रति अविश्वास बढ़ गया है। संदेहभरी नजरों से एक-दूसरे को देखा जा रहा है। यही वजह है कि दो योग्य लोगों के बीच लड़ाई में कोई तीसरा हाथ साफ कर ले जा रहा है। बाहरी लोग अधिकारियों के आपसी रिश्ते में उत्पन्न मनमुटाव को विवाद में बदल रहे हैं।
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गुरु ने पूरी बात समझाने के लिए एक प्रसंग जोड़ा- हाल ही में राजधानी में एक ‘बर्थ डे’ पार्टी हुई। एक ही सेवा के तमाम वरिष्ठ-कनिष्ठ एक समय और एक जगह एकत्रित हुए। आपसी रंजिश वाले दो लोगों के बीच संवाद का बेहतर अवसर था। सुना- वरिष्ठ मिलने के लिए चार कदम आगे बढ़े, कनिष्ठ ने राह बदल ली। 18वीं शताब्दी ईसा पूर्व के हम्मुराबी के कानून (Code of Hammurabi) में ‘आंख के बदले आंख’ (Lex Talionis) का दंडात्मक सिद्धांत दिया गया।
भारतीय जीवन दर्शन में महात्मा गांधी ने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि अगर इस सिद्धांत पर मानव सभ्यता आगे बढ़ी तो पूरी दुनिया अंधी हो जाएगी। कहने का मतलब यह है कि अगर किसी ने कोई गलती की तो सफाई देने का मौका मिलना चाहिए। यहां एक-दूसरे को दोषी मानकर कार्यवाही शुरू हो जा रही। इस पूरी लड़ाई के बीच मलाई कुछ लपड़झंडू उड़ा ले रहे।
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गुरु की बात सुनकर बार-बार लग रहा था, कोई नई कहानी पता चली है। सो, बगैर देर किए सीधे पूछ लिया। गुरु इस बार कौन लपड़झंडू मलाई चाट गया? गुरु बोले- देखो, यूं तो वनांचल में इनकी पूरी फौज है, लेकिन नया माजरा ‘खंगालने’ से सामने आया है। सुना है, जब से आयोग वाली कुर्सी मिली है। ‘साहेब’ के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। पल-पल प्रोटोकॉल की चिंता में पतले हुए जा रहे हैं।
बताने वाले तो यहां तक बताते हैं कि गृह राज्य गमन पर थाना-थाना पुलिस एस्कॉर्ट की आकांक्षा रखते हैं। कई बार अपेक्षित इंतजाम नहीं मिलने पर भड़क जाते हैं। बताने वाले बताते हैं कि राज्य के प्रशासनिक महकमे की कमान मिलने के बाद ‘साहेब’ के रंग-ढंग बदल गए। सेवानिवृत्ति के बाद पुरस्कार स्वरूप ‘आयोग’ का उपहार मिल गया। अहंकार पूरे शबाब पर पहुंच गया।
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अब ‘साहेब’ अपनी सेवा की दूसरी पारी को ऐतिहासिक बनाने पर आमादा हैं। यही कारण है कि आधे-अधूरे परिणाम पर हस्ताक्षर कराने के लिए हर हद पार कर जाते हैं। सुना है- हाल-फिलहाल कुछ ऐसी ही कारगुजारी कर गुजरे हैं। लिहाजा मामला फिर दो समान सेवा के लोगों के बीच टकराव तक पहुंच गया है। भगवान जाने यह लड़ाई किस मोड़ पर जाकर रुकेगी।
बात पूरी कर गुरु अपनी कुर्सी से उठे। मौका देख कान में फुसफुसाकर कहा- गुरु समझ तो गया, लेकिन अब इन ‘साहेब’ का नाम भी बता ही दें। गुरु बोले- नाम का उपनाम ऐसा है कि खंगालते-खंगालते खिसिया जाआगे, जल्दी ऐसा उपनाम नहीं मिलेगा। दफ्तर निकलने का वक्त हो रहा था। सो, सबने एक साथ हाथ जोड़े और विदा लिया।
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