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Jharkhand Elephant Attack : झारखंड में हाथियों का आतंक : डेढ़ महीने में 35 मौतें, वन विभाग बेबस, स्थायी समाधान की उठी मांग

by Birendra Ojha
Chaibasa Elephant Attack
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रांची : झारखंड में इन दिनों हाथियों का आतंक चरम पर है। इस वर्ष की शुरुआत से अब तक महज डेढ़ महीने के भीतर राज्य के अलग-अलग जिलों में 35 से अधिक लोग हाथियों के हमले में जान गंवा चुके हैं। ग्रामीण इलाकों में दहशत का माहौल है और लोग शाम ढलते ही घरों में कैद होने को मजबूर हैं।

बढ़ता मानव-हाथी संघर्ष

राज्य के पूर्वी व पश्चिमी सिंहभूम, हजारीबाग, रामगढ़, पलामू और चतरा जैसे जिलों में हालात सबसे ज्यादा गंभीर हैं। हाल ही में हजारीबाग के गोविंदपुर गांव में सात लोगों को हाथियों ने कुचल डाला। इसके अलावा पश्चिमी सिंहभूम में एक ही हाथी द्वारा 22 लोगों की जान लेने की घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया था। विशेषज्ञों का मानना है कि हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर अवैध खनन और अतिक्रमण के कारण बाधित हो गए हैं। जंगलों के सिकुड़ने से हाथियों के झुंड आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे टकराव की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

वन विभाग के सामने संसाधनों की चुनौती

वन विभाग के पास हाथियों को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। ट्रैंक्विलाइजर गन, आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की भारी कमी बताई जा रही है। कई बार हाथियों को बेहोश करने के बाद उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए बड़े परिवहन साधन तक उपलब्ध नहीं होते।
फिलहाल विभाग लाठी-डंडे, मशाल और पटाखों के सहारे ही झुंड को खदेड़ने की कोशिश करता है, जो अक्सर नाकाफी साबित होता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासनिक उदासीनता के कारण हालात बेकाबू होते जा रहे हैं।

सांसद ने उठाई स्थायी समाधान की मांग

हजारीबाग के सांसद मनीष जायसवाल ने कहा है कि मुआवजा देना और अस्थायी इंतजाम करना पर्याप्त नहीं है। सरकार को हाथियों के कॉरिडोर सुरक्षित करने, अवैध खनन पर सख्ती और दीर्घकालिक रणनीति बनाने की जरूरत है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो मानव-हाथी संघर्ष और भयावह रूप ले सकता है।

क्या है आगे की राह

विशेषज्ञों का सुझाव है कि हाथियों के आवागमन के रास्तों को चिह्नित कर संरक्षित किया जाए, गांवों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जाए और स्थानीय स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया दल गठित किए जाएं। इसके साथ ही जंगल संरक्षण और पुनर्वनीकरण को प्राथमिकता देना अनिवार्य है।
फिलहाल, राज्य में हाथियों का खौफ बरकरार है। सवाल यही है कि क्या सरकार और वन विभाग इस चुनौती से निपटने के लिए ठोस और स्थायी कदम उठा पाएंगे या फिर हर कुछ दिनों में एक नई त्रासदी की खबर सामने आती रहेगी।

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