वाराणसी : काशी को “सात वार नौ त्योहारों का शहर” कहा जाता है, और जब बात होली की हो, तो यह और भी खास हो जाती है। काशी में होली का पर्व रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ के आशीर्वाद से शुरू होता है। इस दिन काशीवासी बाबा को रंग और गुलाल अर्पित करते हैं और होली खेलने की अनुमति प्राप्त करते हैं। रंगभरी एकादशी की अपनी एक पौराणिक मान्यता है, जिसके अनुसार, इस दिन बाबा विश्वनाथ मां गौरा का गौना करने के लिए उनके ससुराल आते हैं।
360 साल पुरानी परंपरा:
रंगभरी एकादशी के इस पर्व की शुरुआत 360 साल पहले हुई थी, और यह परंपरा अब भी बरकरार है। यह परंपरा विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत कुलपति तिवारी के परिवार से शुरू हुई थी। इस अवसर पर काशी में न केवल स्थानीय भक्त, बल्कि देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। काशी में इस पर्व का आयोजन बेहद खास तरीके से किया जाता है, जहां बाबा विश्वनाथ और देवी-देवताओं के साथ भक्त भी होली खेलते हैं।
पौराणिक मान्यता और पूजा विधि:
रंगभरी एकादशी की शुरुआत बसंत पंचमी के दिन बाबा के तिलकोत्सव से होती है, जिसमें बाबा को तिलक चढ़ाया जाता है। इसके बाद हल्दी और कुमकुम की रस्म अदा की जाती है। महाशिवरात्रि पर बाबा विश्वनाथ और मां पार्वती का विवाह होता है। इसके बाद बाबा का गौना कार्यक्रम होता है। इस साल 10 मार्च को यह पर्व मनाया जा रहा है, जब बाबा विश्वनाथ मां गौरा का गौना करने ससुराल आएंगे।
विशेष पोशाक में बाबा का प्रवेश:
इस साल बाबा विशेष पोशाक में होंगे और काशी के भक्तों के साथ साथ अयोध्या और मथुरा से भेजे गए गुलाल के साथ होली खेली जाएगी। महंत आवास में माता पार्वती का मायका सजाया जाएगा और रजत सिंहासन तैयार किया जाएगा, जिसमें बैठकर बाबा नगर भ्रमण करते हुए विश्वनाथ के दरबार में पहुंचेंगे। हालांकि, पिछले दो वर्षों से मंदिर प्रशासन ने इस परंपरा में बदलाव किया है और पालकी यात्रा पर रोक लगा दी है।
कर्नाटक की करूंगली और रुद्राक्ष से बाबा का श्रृंगार:
कार्यक्रम के सह-संयोजक पंडित भानु ने बताया कि इस साल गौना के दिन बाबा देवकीरिट टोपी पहनेंगे, जो मिथिला से आई है। मथुरा और अयोध्या के घरों से तैयार गुलाल भगवान विश्वनाथ के लिए भेजा गया है। इस बार बाबा कर्नाटक की करूंगली और रुद्राक्ष से श्रृंगारित होंगे, और इन्हीं आभूषणों के साथ वह ससुराल में प्रवेश करेंगे और मां गौरा का गौना कराएंगे।
पालकी यात्रा पर प्रतिबंध:
पिछले कुछ वर्षों से महंत आवास से बाबा की रजत प्रतिमा पालकी पर सवार होकर बनारस की विभिन्न गलियों से होते हुए विश्वनाथ धाम जाती थी, लेकिन इस बार मंदिर प्रशासन ने पालकी यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया है। वाराणसी जिला प्रशासन ने रंगभरी एकादशी की पालकी यात्रा को रोकने का आदेश जारी किया है, जिसके कारण महंत परिवार और अन्य राजनीतिक दलों द्वारा विरोध किया जा रहा है। हालांकि, महंत आवास पर ही इस परंपरा का निर्वहन किया जाएगा।
विश्वनाथ धाम में विशेष कार्यक्रम:
मंदिर प्रशासन ने इस वर्ष रंगभरी एकादशी के उत्सव के लिए भव्य तीन दिवसीय कार्यक्रम की योजना बनाई है। रविवार सुबह हल्दी लगाने की प्रथा का निर्वहन किया गया, जबकि शाम को गुलाल होली खेली जाएगी। 10 मार्च को सुबह भस्म अर्पण होगा, उसके बाद हल्दी और भस्म अर्पण की रस्में होंगी। शाम को कृष्ण जन्मस्थान मथुरा से प्राप्त होली सामग्री और पलाश गुलाल को बाबा विश्वनाथ और मां गौरा को अर्पित किया जाएगा। इसके बाद शाम 4 बजे मंदिर चौक से बाबा की चल विग्रह की पालकी शोभायात्रा निकाली जाएगी।
रंगभरी एकादशी का यह उत्सव काशीवासियों के लिए न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह संस्कृति और परंपरा का प्रतीक भी है, जो सदियों से कायम है।

