स्पेशल डेस्क। राहुल सिंह (एसोसिएट प्रोफेसर, विश्व-भारती, शांति निकेतन) : Osprey (ओस्प्रे )एक बाज का नाम है जो सर्दियों में अमेरिका के समुद्री तटों से भारत में प्रवासी पक्षी के रुप में आता है। इसकी खूबी यह है कि ताजा और जिंदा मछलियों के शिकार के जरिये ही यह अपनी भूख मिटाता है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह किसी भी जलाशय या पोखर में अपना डेरा डाल देता है।

अमूमन यह उन जलाशयों में देखा जाता है जहाँ दूसरे शीत ॠतु के प्रवासी पक्षी आते हैं। बड़े बांधों में भी इसे शिकार करते हुए देखा जाता है। लेकिन बड़े बांध बर्ड फोटोग्राफरों के लिए उतने अवसर उपलब्ध नहीं कराते हैं, जितने छोटे आहर और पोखर उपलब्ध कराते हैं। Osprey को हिन्दी में मछरंगा बाज कहते हैं। हवा से पानी में शिकार करने की इसकी काबिलियत इसे खास बनाती है, और यह जो शिकार का क्षण होता है, वह फोटोग्राफरों के लिए कुछ खास होता है।
हर फोटोग्राफर का सपना होता है कि वह मछरंगा को मछली के साथ अलग अलग भंगिमाओं में कैद करे, फोटोग्राफरों की यह चाहत उन्हें पश्चिम बंगाल के पूर्बस्थली खींच ले जाती है। पूर्बस्थली एक ऐसी जगह के तौर पर पक्षी प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हो रहा है जहाँ सर्दियों में ओस्प्रे से शर्तिया मुलाकात हो सकती है। ओस्प्रे के प्रति बर्ड फोटोग्राफरों की दीवानगी ने पूर्बस्थली के मछुआरों का ना केवल रोजगार उपलब्ध कराया है बल्कि उसके आस पास छोटे-मोटे होटल और होम स्टे का भी रोजगार चल निकला है।
ओड़िशा के चिल्का का नाम आपने सुना ही होगा। चिल्का यूं तो प्रसिद्ध है सबसे बड़े मीठे पानी के झील के लिए और अपने झींगा के लिए। लेकिन डॉल्फिन टूरिज्म के नाम पर चिल्का जितने का धंधा करता है और जितना रोजगार उसने दे रखा है वह किसी के लिए भी चौंकाने वाला हो सकता है। जो भी भुवनेश्वर और पुरी जाते हैं वह चिल्का भी घूम ही आते हैं। तो यहाँ ट्रैवल एजेंसियों के लिए रोज का रोजगार सृजित होता है।
चिल्का में पर्यटकों के दोहन का एक विलक्षण उदाहरण मौजूद है। चिल्का घूमने के लिए आपको मोटर बोट किराये पर लेना होता है। आप अकेले हों तो भी आप बोट किसी के साथ शेयर नहीं कर सकते हैं। आप अकेले हों तब भी आपको पूरी बोट किराये पर अकेले लेनी होगी। चिल्का का रकबा इतना बड़ा है कि वह समुन्दर सा जान पड़ता है। अरब सागर चिल्का से लगता है। जहां अरब सागर और चिल्का मिलते हैं वह सुनने में जितना रोमांचित करता है, देखने में नहीं। चिल्का के एक टापू में एक खास किस्म के केकड़े बहुतायत में पाये जाते हैं।
कई बार नाववाला उस केकड़े को मारकर उससे मोतीनुमा एक चीज निकालकर दिखाता है। पर डेढ़ दो घंटे की बोटिंग के बाद एक स्पॉट पर आपको ले जाकर खड़ा कर दिया जाता है। वहाँ अगर आप खुशकिस्मत हों तो डाल्फिन आपको दिख सकती है। वह फिल्मों के माफिक पानी में उछलती डॉल्फिन नहीं होती। बस पानी की सतह पर आकर करवट या सांस लेती डॉल्फिन होती है, जिसे देखने के लिए आपको काफी कोशिश करनी होती है। और ऐसा करते हुए आपको अहसास होता है कि डाल्फिन के नाम पर आप ठगी के शिकार हो गये हैं।
औसतन चिल्का की एक ट्रीप में आप दस बारह हजार न्यूनतम तो खर्च करते ही हैं। पर इसकी बजाय चार पांच सौ रुपये के खर्चे पर बहुत शानदार तरीके से आप बिहार के सुल्तानगंज की गंगा में डॉल्फिन को चुहल करते हुए देख सकते हैं। पर बिहार या उससे अलग हुए झारखंड के पास पर्यटन को लेकर कोई व्यवस्थित रोडमैप और दृष्टि नहीं है। पश्चिम बंगाल और ओड़िशा इस मामले में बिहार और झारखंड से बहुत आगे और बेहतर हैं। बल्कि हाल के वर्षों में छत्तीसगढ़ के अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूँ कि छत्तीसगढ़ ने भी इस दिशा में इन दोनों राज्यों की तुलना में बेहतर विकास किया है।
झारखंड में तो पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। पश्चिम बंगाल के पर्यटक साल भर झारखंड को गुलजार किये रहते हैं। अगर झारखंड-बिहार के पक्षियों के हॉटस्पॉट को कायदे से संरक्षित कर पर्यटन के लिए खोल दिया जाये तो भरतपुर, नाल सरोवर, मंगला जोड़ी जैसा जादू यहाँ भी पैदा किया जा सकता है। लेकिन यहाँ पर्यटन मतलब एक बेतरतीब और बेढब किस्म का सौंदर्यीकरण मात्र बन कर रह गया है। दस से पचास रुपये की टिकट और पार्क से आगे झारखंड पर्यटन सोच ही नहीं पा रहा है। जरुरत इस दिशा में सोचने की है क्योंकि इस दिशा में अपार संभावनाएं हैं।
स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने की भी पर्याप्त संभावनाएं हैं। एक ऐसे दौर में जब सबको सरकारी नौकरी दे पाना संभव नहीं है वैसे में पर्यटन के जरिये स्थानीय स्तर पर अच्छी संख्या में रोजगार पैदा किया जा सकता है। रांची के पास ओरमांझी में एक चिड़िया घर है। आप वहाँ जायें शायद कभी आपको बगैर दो चार घंटे की प्रतीक्षा के भीतर घूमने के लिए बैट्री चालित गाड़ी मिले। यह एक दिन की समस्या नहीं है, रोज की है, पर शायद ही इसका निदान अब तक हो सका है।
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