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जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर खुद को बता रहे विकास की राजनीति के वाहक, क्या जनता बनाएगी ‘किंग’

प्रशांत किशोर ने तेजस्वी की योग्यता और नीतीश की मानसिक स्थिति को निशाना बनाया है। हाल ही में BPSC परीक्षा घोटाले के विरोध में छात्रों के साथ खड़े हुए। पदयात्राएं भी कर रहे हैं, जिससे जनता के बीच उनकी पहुंच और स्वीकार्यता बढ़े।

by Reeta Rai Sagar
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फीचर डेस्क: चुनावी रणनीतिकार और जन सुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर को जनता उन्हें किस रूप में अपनाएगी, यह एक बड़ा प्रश्न है। प्रशांत किशोर हमेशा से किंगमेकर की भूमिका में रहे हैं लेकिन इस बार ‘किंग’ बनना चाहते हैं। इसके लिए प्रक्रिया उन्होंने बहुत पहले ही शुरू कर दी थी, लेकिन बिहार में जातीय समीकरण एक बड़ा मसला है, जिसे कोई भी पार्टी अनदेखा नहीं कर सकती है।

क्या कर रहे नीतीश व तेजस्वी
जहां एक ओर नीतीश कुमार बिहार विधानसभा चुनाव के जरिए अपने बेटे निशांत कुमार को स्थापित करने में लगे है, तो वहीं राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव लगातार नीतीश कुमार पर आरोप लगा रहे हैं। दूसरी ओर किशोर युवाओं के मन के वादे और एक नए बिहार का ख्वाब दिखा रहे हैं। जहां शिक्षा से लेकर रोजगार औऱ कोशी के बाढ़ तक सबका निदान बता रहे हैं।

प्रशांत ने की है सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा
अब प्रशांत किशोर ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी और दिल्ली की आम आदमी पार्टी की तर्ज पर जीत दर्ज करेगी। हालांकि, यह राह आसान नहीं है। किशोर पर हमेशा से ‘बी टीम’ होने का आरोप लगता रहा है। राजनीतिक विरोधी और समीक्षक किशोर पर आरोप लगाते आए हैं कि वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ मिले हुए हैं और विपक्षी वोट काटने के लिए चुनावी मैदान में उतरे हैं। हालांकि, किशोर ने ऐसे आरोपों का खंडन किया है और खुद को विकास की राजनीति का वाहक बताया है।

जातिवादी राजनीति में वर्ग आधारित बदलाव की कोशिश
बिहार की राजनीति लंबे समय से जातिगत समीकरणों पर आधारित रही है। नजर डालें तो, मंडल आयोग के बाद से राज्य में केवल पिछड़ी जातियों (OBC) के नेता मुख्यमंत्री बने हैं। ब्राह्मण समुदाय से आने वाले प्रशांत किशोर इस राजनीतिक समीकरण को चुनौती दे सकते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय और लोकनीति द्वारा कराए गए सर्वे में 57 प्रतिशत लोगों ने अपने जाति से जुड़े नेता को प्राथमिकता दी थी। हालांकि किशोर की पार्टी किसी जाति विशेष पर आधारित नहीं है और विकास आधारित राजनीति की बात करती है।

जन सुराज पार्टी का चुनावी प्रदर्शन और रणनीतिक चूक
जन सुराज पार्टी ने पिछले वर्ष चार सीटों पर हुए उपचुनाव में 10 प्रतिशत वोट हासिल किए, लेकिन सभी सीटें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने जीत लीं। इमामगंज और रामगढ़ में पार्टी को इतने वोट मिले जो वह हार-जीत के अंतर से अधिक थे। इससे यह स्पष्ट हुआ कि JSP विपक्षी वोटों को प्रभावित कर रही है। 2020 में महागठबंधन ने इनमें से तीन सीटें जीती थीं, लेकिन उपचुनाव में उनका वोट प्रतिशत 10 प्रतिशत घटा। NDA को 9 प्रतिशत का फायदा हुआ, जबकि JSP ने सीधा 10 प्रतिशत वोट प्राप्त किया। बेलागंज में JSP ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारा और 11 प्रतिशत वोट हासिल किए, जिससे महागठबंधन के वोट में 16 प्रतिशत की गिरावट आई।

चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि उपचुनाव में उतरकर प्रशांत किशोर ने रणनीतिक चूक की। इससे पार्टी की संभावनाओं को लेकर बना सस्पेंस खत्म हो गया और उसे महज वोट-कटर पार्टी के रूप में देखा जाने लगा।

बिहार की सत्ता का समीकरण: JD (U) की भूमिका
राष्ट्रीय जनता दल (RJD), जनता दल यूनाइटेड (JD(U)), और भारतीय जनता पार्टी (BJP) — ये तीन प्रमुख पार्टियां बिहार की राजनीति में फिलहाल प्रभावशाली दिख रही हैं। इनमें JD(U) सत्ता की चाबी रखती है। जिस भी गठबंधन में JD(U) जाती है, वही आमतौर पर सत्ता में आता है।

इस समय NDA गठबंधन में JD(U), BJP, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मंच शामिल हैं। वहीं, INDIA गठबंधन में RJD, कांग्रेस, विकासशील इंसान पार्टी और वाम दल हैं। जन सुराज पार्टी, AIMIM, BSP जैसी अन्य पार्टियां किसी भी बड़े गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। ऐसे दलों का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2005 में रहा, जब उन्होंने 18 से अधिक सीटें जीती थीं। लेकिन 2020 तक यह संख्या सात सीटों पर आ गई और इनका वोट शेयर 27 प्रतिशत से घटकर 17 प्रतिशत पर आ गया।

क्या प्रशांत किशोर बन सकते हैं ‘किंगमेकर’?
2020 के चुनाव में तेजस्वी यादव युवाओं के बीच लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे और लगभग सत्ता प्राप्त कर ली थी। वे बेरोजगारी, महंगाई, और शिक्षा जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहे हैं। प्रशांत किशोर ने तेजस्वी यादव की शैक्षणिक योग्यता और नीतीश कुमार की मानसिक स्थिति को निशाना बनाया है। हाल ही किशोर BPSC परीक्षा घोटाले के विरोध में छात्रों के साथ खड़े हुए। इसमें उन्होंने जनता के मुद्दों से जुड़ाव को स्पष्ट रूप से दर्शाया। वे पदयात्राएं भी कर रहे हैं, जिससे जनता के बीच उनकी पहुंच और स्वीकार्यता बढ़े।

हाल में हुए सर्वे पर नजर डालें तो, मुख्यमंत्री के तौर पर पसंद किए जाने पर किशोर को 15 प्रतिशत समर्थन मिला, जबकि नीतीश कुमार को 18 प्रतिशत और तेजस्वी यादव को 41 प्रतिशत समर्थन प्राप्त है।
क्या जन सुराज पार्टी बना सकती है संतुलन बिगाड़ने वाली ताकत?

2025 के विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी के सत्ता में आने की संभावना कम है, लेकिन त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनने पर यह पार्टी एक प्रभावशाली भूमिका निभा सकती है। यदि नीतीश कुमार राजनीति से संन्यास लेते हैं, तो JD(U) के वोट बैंक को अपनी ओर खींचने का मौका प्रशांत किशोर को मिल सकता है।

कुल मिलाकर किशोर जीते या हारे, लेकिन वो वोट शेयरिंग में अहम भूमिका निभा सकते है।

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