स्पेशल रिपोर्ट, नई दिल्ली : दवाइयां सबसे मुश्किल वक्त में काम आती हैं। कभी ना कभी हर परिवार को दवाइयां की खरीद करनी पड़ती है। अधिकतर परिवारों में कोई न कोई एक व्यक्ति नियमित रूप से किसी न किसी बीमारी के लिए रोजाना दवाइयां लेता ही है। यह घर के बजट का हिस्सा होता है। दवाइयों के इस बड़े बाजार में पिछले कुछ वर्षों से जेनेरिक दवाइयों की चर्चा हो रही है। ब्रांडेड दवाइयों और जेनेरिक दवाइयों को लेकर लोगों में अभी बहुत असमंजस है। इन मुद्दे पर लोगों के अलग-अलग तर्क सामने आते हैं। कोई जेनेरिक दवाइयों को सपोर्ट करता नज़र आता है तो कोई इसके विरोध में खड़ा हो जाता है।इस पूरी बहस के बीच आज हम आपको बताते हैं कि आखिर ब्रांडेड और जेनेरिक दवाइयों में क्या अंतर होता है? साथ ही यह भी बता रहे हैं कि जेनेरिक दवाइयों आखिर इतनी सस्ती क्यों होती है।
सीधे शब्दों में कहें तो बाजार में दो तरह की दवाइयां मिलती हैं। इन दोनों के बीच अंतर बताने से पहले बताते हैं कि आखिर दवाइयां कैसे बनती हैं। दरअसल, एक फॉर्मूला होता है, जिसमें अलग-अलग केमिकल मिलाकर दवाईयां बनाई जाती हैं। जैसे किसी दर्द को ठीक करने के लिए जिस पदार्थ का इस्तेमाल होता है, उस पदार्थ से दवाएं बना ली जाती हैं। जब ये दवाएं किसी बड़ी ड्रग कंपनी की ओर से बनाई जाती हैं तो यह ब्रांडेड दवाईयां बन जाती हैं। वैसे यह सिर्फ कंपनी का नाम होता है, जबकि यह बनती जिन पदार्थों से हैं, वह आप दवाओं के रैपर पर कंपनी के नाम के ऊपर देख सकते हैं।

वहीं, जब उन्हीं पदार्थों को मिलाकर बगैर पेटेंट के कोई दवाई बनाती है तो बाजार में इसे जेनेरिक दवाइयां कहते हैं। इन दोनों दवाइयों में कोई अंतर नहीं होता है, बस सिर्फ नाम और ब्रांड का फर्क होता है। जैसे मान लीजिए आप कोई सामान किसी बड़े ब्रांड की कंपनी अथवा किसी छोटी कंपनी से खरीद रहे हो। दोनों में दवाओं के बनाने का फॉर्मूला एक ही होता है। इसलिए दवा की क्वालिटी में कोई अंतर नहीं होता है। ब्रांडेड कंपनियों के पेटेंट खत्म होने के बाद जेनेरिक दवाएं बननी शुरू होती हैं।
फार्मेसी एक्सपर्ट विनीत भार्गव बताते हैं कि ‘दवाइयां सॉल्ट और मोलिक्यूल्स से बनती हैं। इसलिए हमेशा दवाइयां खरीदते वक्त उसके सॉल्ट पर ध्यान देना चाहिए। किसी कंपनी पर नहीं, जिसके नाम से दवाई बिक रही हैं। साथ ही भार्गव ने बताया कि, ‘जेनेरिक दवाएं वे हैं, जो जेनेरिक नाम से बेची जाती हैं। जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं के बीच एकमात्र बड़ा अंतर छवि बनाने और बिक्री बढ़ाने के लिए उपयोग की जाने वाली मार्केटिंग रणनीतियों का होता है। सालों से ड्रग इंडस्ट्री, दवा निर्माताओं ने जेनेरिक दवाओं के बेहतर विकल्प के रूप में ब्रांडेड दवाओं की छवि को बनाया है।
बुखार और दर्द की दवा जेनेरिक अगर आप खरीदेंगे तो वह 10 पैसे प्रति टेबलेट से डेढ़ रुपये तक में मिल जाएगी। यही साल्ट होने पर सिर्फ नाम बदला गया तो दवा ब्रांडेड हो जाएगी। ब्रांडेड दवा डेढ़ रुपये से लेकर 38 रुपये तक मिल जाती है। ब्रांडेड दवा की बिक्री बढ़ाने के लिए उनकी मार्केटिंग होती है। कंपनियां अपने प्रोडक्ट बनाकर उनका प्रचार कराती हैं। जेनेरिक दवा का कोई प्रचार नहीं होता है।
कैसे आम आदमी बड़ी संख्या में खरीदते हैं ब्रांडेड दवाएं
दरअसल अधिकांश लोग अलग-अलग बीमारियों के इलाज के लिए ब्रांडेड दावाओं का इस्तेमाल करते हैं। इसके पीछे बड़ा कारण यह होता है कि चिकित्सक अपने परिचय पर ब्रांडेड दावों के नाम ही लिखते हैं। इसी कारण आम आदमी बड़ी आसानी से दवा दुकानों पर पहुंचकर चिकित्सा का परिचय देकर महंगी कीमत पर ब्रांडेड दवाएं खरीद लेता है। लोगों को पता भी नहीं होता कि सेम कंपोजिशन में बेहद सस्ते दर पर जेनेरिक दवाएं उपलब्ध होते हैं। दावाओं के ब्रांड का आलम यह है कि कई बार चिकित्सकों की ओर से लिखी गई दवाएं उनकी क्लीनिक या हॉस्पिटल में ही मिलती हैं। पूरे बाजार में उनकी सप्लाई नहीं होती। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण बड़ा मुनाफा कमाना होता है।

