अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं के बीच जहां जंगल अपनी ही भाषा में सांस लेते हैं और रास्ते अक्सर इतिहास से अधिक स्मृति की ओर ले जाते हैं, वहीं कहीं समय से थोड़ा अलग खड़ा है 52 देवरी जैन मंदिरों का समूह। यह कोई एक मंदिर नहीं बल्कि साधना की एक पूरी बस्ती है, जो अब तीर्थ से अधिक एक गूढ़ प्रश्न की तरह सामने आती है। यहां आकर यात्री नहीं, बल्कि भीतर का जिज्ञासु मन चलता है।

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मेरी यात्रा सुबह के उस धुंधले उजाले में शुरू हुई, जब कुंभलगढ़ के जंगल अभी पूरी तरह जागे नहीं थे। रास्ता कच्चा था, मगर मन के भीतर जो पगडंडी खुल रही थी, वह बहुत स्पष्ट थी। जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ा रास्ते दुर्गम मगर और ज्यादा स्पष्ट होते गए। मोबाइल नेटवर्क अपने होने और नहीं होने की लड़ाई लड़ता रहा और उसी के साथ छूटती गई आधुनिक समय की सारी अधीरता।
इस जगह पर आने का अर्थ था, इस अद्भुत मंदिर का दर्शन करना। इसके साथ ही उस संरचना को समझना, जिसने लाखों लोगों के दिलों में आस्था का संचार किया है।
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पहली देवरी सामने आई तो लगा जैसे पत्थर मुझे देख रहे हों। न कोई घंटी, न कोई पुजारी, न अगरबत्ती की गंध- सिर्फ़ टूटी-फूटी दीवारें, स्तंभ और छतरियां, जो कभी पूर्ण थीं। इन मंदिरों को देखकर यह एहसास होता है कि आस्था को आवाज़ की ज़रूरत नहीं होती; वह चुपचाप भी पूरी हो सकती है। जैन दर्शन की यही विशेषता है- मौन को माध्यम बनाना।
इतिहास बताता है कि इन मंदिरों का निर्माण लगभग 11वीं- 12वीं शताब्दी में हुआ, जब यह क्षेत्र जैन व्यापारियों और साधकों का प्रमुख केंद्र था। देवरी शब्द स्वयं छोटे मंदिर या चैत्य का संकेत देता है। और 52 की संख्या मात्र गणना नहीं, बल्कि पूर्णता का प्रतीक जान पड़ती है। आज भले ही सब मंदिर पूर्ण रूप में खड़े न हों, पर उनकी अपूर्णता ही उनका सबसे बड़ा सौंदर्य है।
वास्तुकला की दृष्टि से ये मंदिर आश्चर्यजनक हैं। सोलंकी शैली की झलक, बारीक नक्काशी, कमलाकार छतें और स्तंभों पर उकेरे गए तीर्थंकरों के सूक्ष्म संकेत। सब कुछ बहुत संयमित। यहां वैभव नहीं, संतुलन है। लगता है जैसे शिल्पकारों ने हथौड़े से नहीं, ध्यान से पत्थर तराशे हों। हर आकृति में एक ठहराव है, जो देखने वाले को भी ठहरा देता है।
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मैं एक मंदिर की टूटी हुई सीढ़ियों पर बैठ गया। सामने जंगल फैला था- नीम, खैर और धोक के पेड़। हवा जब पत्थरों से टकराती, तो एक धीमी-सी सरसराहट पैदा होती, मानो कोई पुराना मंत्र दोहराया जा रहा हो। उस क्षण मुझे लगा कि ये मंदिर खंडहर नहीं हैं, बल्कि ध्यान की स्थायी मुद्रा में बैठे साधक हैं। आंखें बंद, पर उपस्थिति पूर्ण।
52 देवरी मंदिरों से जुड़ी कई लोककथाएं भी हैं। कहा जाता है कि जब बाहरी आक्रमणों का समय आया तो साधकों ने इन मंदिरों को छोड़ दिया, पर अपनी साधना नहीं। वे जंगलों में विलीन हो गए, जैसे जैन दर्शन की अपरिग्रह की भावना स्वयं साकार हो उठी हो। मंदिर रह गए, मौन साक्ष्य की तरह।
इस जगह पर घूमते हुए समय की रेखा धुंधली हो जाती है। कोई बताने वाला नहीं कि कौन-सा मंदिर किस तीर्थंकर को समर्पित था, कौन-सी मूर्ति किस काल की है और शायद यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। यह स्थान आपको जानकारी नहीं, अनुभूति देता है। यहां इतिहास किताबों में नहीं, कदमों की आहट में बसा है।
मेरी यात्रा का सबसे गहरा क्षण तब आया, जब सूर्य ढलने लगा। पत्थरों पर सुनहरी रोशनी पसर गई और टूटे स्तंभों की परछाइयां लंबी हो गईं। उस समय मुझे लगा कि यह जगह जैन दर्शन के पांच महाव्रतों को जी रही है- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। यहां कुछ भी ज़्यादा नहीं है और यही इसकी पूर्णता है।
52 देवरी जैन मंदिर आज किसी धार्मिक अनुष्ठान का केंद्र नहीं, बल्कि आत्मिक संवाद का स्थल हैं। यहां आने वाला व्यक्ति पूजा नहीं करता, बल्कि सुनता है। अपने भीतर की आवाज़, पत्थरों की ख़ामोशी और जंगल की सांसों को। यह यात्रा बाहर की नहीं, भीतर की होती है।
जब मैं वापस लौटा, तो लगा कि मैं कुछ लेकर नहीं, बल्कि कुछ छोड़कर आया हूँ। शोर, जल्दबाज़ी और अनावश्यक बोझ। 52 देवरी मुझे यह सिखा गई कि हर यात्रा का उद्देश्य पहुंचना नहीं, बल्कि सरल होना है। और शायद यही इन मंदिरों की सबसे बड़ी साधना है, मनुष्य को थोड़ा और मनुष्य बना देना।
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