Old Hindi Film Story : वर्ष 1967 में आई मनोज कुमार और साधना अभिनीत फिल्म अनीता, उस रहस्य त्रयी की आखिरी फिल्म है जो जाने माने निर्देशक राज खोसला ने सन् 1960 के दशक में बनाईं थीं । इस त्रयी की पहली दो फिल्में, ‘वो कौन थी’ और ‘मेरा साया’ इससे पहले सफलता के नए आयाम गढ़ चुकी थीं । अगर मेरा साया और वो कौन थी से तुलना की जाए तो बॉक्स ऑफिस पर फिल्म का प्रदर्शन कमजोर था और फिल्म असफल रही थी, पर इस फिल्म में भी साधना के अभिनय की खूब तारीफ की गई थी ।

फिल्म की कथा यह है कि नीरज (मनोज कुमार) और अनीता (साधना) एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं, लेकिन अनीता के करोड़पति पिता बिहारी लाल (सज्जन) को यह मंजूर नहीं है, क्योंकि नीरज एक साधारण नौकरी करता है और अनीता करोड़पति है । जब उसके पिता नीरज से उसकी शादी को नामंजूर कर देते हैं, तो अनीता नीरज से मिलने जाती है और उससे सिविल मैरिज करने का अनुरोध करती है। जब दोनों कोर्ट पहुंचते हैं, तो उसके पिता वहां आ जाते हैं और उसे अपनी इच्छा के विरुद्ध शादी करने के गंभीर परिणामों की चेतावनी देते हैं । अनीता अपने पिता की इच्छा का सम्मान करती है और कोर्ट से बिना शादी किए वापस लौट आती है ।
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अनीता के पिता चाहते हैं कि उसकी शादी अनिल शर्मा (किशन मेहता) से हो, अनिल खुद को एक बड़े व्यवसायी के रूप में दर्शाते हुए बिहारी लाल को प्रभावित कर चुका है । इधर नीरज जब अनीता से बात करने की कोशिश करता है, तो वह उसे अपने जीवन में वापस न आने के लिए कहती है । प्रेम में टूटे नीरज को जल्द ही अनीता का एक पत्र मिलता है, जिससे उसके मन में संदेह पैदा होता है। वह उससे मिलने जाता है, लेकिन उसे पता चलता है कि उसने आत्महत्या कर ली है। नीरज को कुछ गड़बड़ लगती है और वह खुद सच्चाई का पता लगाने का फैसला करता है ।

नीरज को अनीता ठीक उसी जगह दिखती है जहाँ उसने कथित तौर पर आत्महत्या की थी । नीरज का दोस्त उसे छुट्टी पर जाने और उस घटना को भूलने की सलाह देता है । छुट्टी के दौरान, एक पिकनिक में, नीरज को अनीता फिर से भगवा वस्त्र पहने साध्वी माया के रूप में दिखाई देती है । नीरज को पता चलता है कि उसने माया जोगन (जिसका किरदार भी साधना ने निभाया है) को देखा था, जिसकी मृत्यु 20 साल पहले हो गई थी। ट्रेन के एक डिब्बे में उसे अनीता फिर से दिखाई देती है । इस लुका-छिपी के खेल की तमाम सारी साजिशों के पर्दाफाश के लिए क्या – क्या किया जाता है और कैसे – कैसे किया जाता है, यह जानने का सबसे बढ़िया तरीका है यह फिल्म देखना
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फिल्म के निर्देशक राज खोसला शास्त्रीय संगीत में शिक्षित थे और उन्होंने अपनी शुरुआत ऑल इण्डिया रेडियो (आकाशवाणी) से की । बाद में देवानंद की सलाह पर महान फिल्मकार गुरुदत्त के सहायक बन गए । उनके गुरु गुरुदत्त ने उन्हें पहली बार मिलाप (1952) का निर्देशन करने की जिम्मेदारी दी । फिल्म चली नहीं, पर उन पर भरोसा कायम रखते हुए गुरुदत्त ने उन्हें फिल्म सीआईडी (1954) के निर्देशन का जिम्मा दिया । फिल्म बहुत सफल हुई और इसके बाद राज खोसला ने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा । साधना को ‘मिस्ट्री गर्ल’ की उपाधि से नवाजने वाली रहस्य त्रयी की यह आखिरी फिल्म, त्रयी की पहली दो फिल्मों के मुकाबले कमजोर फिल्म मानी जाती है और कुछ एक आलोचक इसे हिचकॉक की 1958 में रिलीज फिल्म ‘वर्टिगो’ से प्रेरित मानते हैं ।
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इस फिल्म की पटकथा जी आर कामथ और संवाद चंद्रकांत ने लिखे थे । आरज़ू लखनवी, आनंद बक्शी और राजा मेहंदी अली खान के लिखे गीतों को लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की जोड़ी ने संगीत से संवारा था और गीतों को स्वर दिये थे उषा मंगेशकर, लता मंगेशकर और मुकेश ने ।
मैं देखूँ जिस ओर सखी री, गोरे गोरे चाँद से मुख पे, ना बाबा ना बाबा पिछवारे बुड्ढा खाँसता जैसे कर्णप्रिय और लोकप्रिय गीतों और बेहतरीन संवाद अदायगी वाली इस फिल्म का जो मुख्य आधार था, इस फिल्म की कहानी या यूं कहें प्लॉट, उसमें कोई नयापन नहीं था ।
एक नायिका का गायब हो जाना, हमशक्ल का दिखना, भूत वगैरह का डर और अंत में सुखांत यानि नायक और नायिका का मिलन – इस एक रेसिपी को अपने दर्शकों के सामने दो अलग-अलग फिल्मों में राज खोसला पहले ही परोस चुके थे । दर्शकों के लिए नए गीतों के अतिरिक्त फिल्म में ना कोई नया रोमांच था, ना कोई नई संभावना । हिन्दी सिनेमा में पहली बार भले राज खोसला साहब ने स्प्लिट पर्सनैलिटी डिसॉर्डर जैसी मानसिक अवधारणा के रेफरेंस प्रयोग किए थे पर दर्शक जानते हैं कि ये रेफरेंस भी सिर्फ कहानी में रहस्य और रोमांच बनाये रखने के टूल्स ही थे और फिल्म में इस समस्या के लिए कोई स्पष्ट स्वर अभिव्यक्त नहीं होता था ।
शायद इस फिल्म की असफलता थी या इस प्रकार की कहानियों को नए तरीके से कहने का चैलेंज, राज खोसला अनीता की असफलता के बाद प्रेम कहानियों और शुद्ध मनोरंजन की ओर मुड़ गए और उनके निर्देशन में कच्चे धागे, शरीफ बदमाश, मेरा गाँव मेरा देश, मैं तुलसी तेरे आँगन की जैसी फिल्में आई और अगले दो दशकों तक भारतीय दर्शकों ने उन्हें सर आँखों पर बिठाए रखा ।
अनीता फिल्म की कोई भी चर्चा अधूरी होगी अगर मनोज कुमार और साधना के सशक्त अभिनय के साथ ही हम मुकरी, धूमल, चाँद उस्मानी, बीरबल, हेलेन, बेला बोस और आई एस जौहर जैसे अदाकारों की सधी हुई अदाकारी की चर्चा ना करें । अनीता देखने वाले दर्शकों को फिल्म में ज्योतिषी की भूमिका निभाने वाले अदाकार उल्हास के विषय में एक रोचक तथ्य जानना चाहिए । 1913 में अजमेर में जन्में उल्हास का असली नाम एम. एन. कौल था और वो एक कश्मीरी पण्डित परिवार से आते थे ।
उनकी मृत्यु 1969 में हो गई थी परंतु उनके अभिनय से सजी फिल्में अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षों तक रिलीज होती रहीं । वर्ष 1982 में प्रदर्शित यश चोपड़ा की फिल्म सवाल को उनकी आखिरी फिल्म माना जाता है । अनीता यूट्यूब सहित विभिन्न स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर देखने के लिए उपलब्ध है । और साधना के सशक्त अभिनय और बेहतरीन गीतों के लिए देखी जानी चाहिए ।
लेखक – वैभव मणि त्रिपाठी
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