राजस्थान के मानचित्र पर अलवर एक ऐसा नाम है, जो अक्सर अनदेखा रह जाता है। जयपुर और दिल्ली के बीच बसे इस नगर को लोग रास्ते में पड़ने वाली एक जगह समझकर आगे बढ़ जाते हैं, पर मेरी यह तीन दिन की यात्रा उसी चुप्पी को सुनने की कोशिश थी। दिल्ली से चलकर जैसे ही ट्रेन अलवर के स्टेशन पर रुकी, मुझे हवा में एक अलग-सी ऐतिहासिक गंध महसूस हुई। ऐसा लगा जैसे समय यहां तेज़ी से नहीं, बल्कि सोच-समझकर चलता हो। प्लेटफॉर्म से बाहर निकलते ही अरावली की पहाड़ियां दूर-दूर तक फैली दिखीं, मानो शहर को अपनी बाहों में घेरे खड़ी हों। मेरी इस यात्रा का उद्देश्य पूरी तरह से अपरिभाषित था। इसकी वजह से पहला दिन कुछ दोस्तों से मिलने और इस जगह के परिचय से शुरू हुआ।

सुबह मैंने अलवर की गलियों में खुद को छोड़ दिया। पुरानी इमारतें, पीले-गुलाबी रंग की दीवारें और छोटे-छोटे बाज़ार किसी पुराने चित्र की तरह मेरे सामने थे। दोपहर होते-होते एक दोस्त के सुझाव पर मैं अलवर सिटी पैलेस पहुंचा। यह महल बाहर से जितना सादा दिखता है, भीतर उतना ही गहरा और गंभीर है। इसकी दीवारों पर लगे आईने, मेहराबों की बनावट और आंगन की खामोशी। यह सब कुछ राजसी वैभव से ज़्यादा एक गुजरे हुए समय के ठहराव की कहानी कहते हैं। यहां घूमते हुए लगा कि सत्ता और शान भी अंततः मौन में ही जाकर विश्राम पाते हैं।
शहर गतिमान, पहाड़ स्थिर
शाम ढलने लगी तो शहर का रंग बदलने लगा। बाज़ारों में चहल-पहल बढ़ गई। कचौड़ी और दूध की जलेबी की खुशबू हवा में तैर रही थी। मैंने एक छोटी-सी दुकान पर बैठकर चाय पी और दुकानदार से बातों-बातों में अलवर के बदलते मिज़ाज और स्वाद के बारे में जाना। इस जगह पर उगने वाली जैविक सब्जियों की बात करते हुए उसने कहा- शहर आगे बढ़ रहा है, पर पहाड़ अब भी यहीं खड़े हैं और यह हमेशा ऐसे ही रहेंगे। यह वाक्य मेरे साथ रह गया। रात को होटल की छत से मैंने दूर दिखते किले की रोशनी देखी। अंधेरे में खड़ा एक प्रहरी, जो अब भी शहर की रखवाली करता जान पड़ता है।
दूसरे दिन की सुबह मेरे कदम उसी प्रहरी की ओर बढ़े। बाला किला तक पहुंचने का रास्ता घुमावदार और चढ़ाई भरा है। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, शहर नीचे सिमटता चला जाता है। किले की दीवारों को छूते ही इतिहास हाथों में उतर आता है। यह किला दिखावे के लिए नहीं बना; यह रणनीति, सुरक्षा और धैर्य का प्रतीक है। ऊपर से अलवर को देखने पर समझ आता है कि क्यों इस स्थान को सदियों तक महत्वपूर्ण माना गया। हवा तेज़ थी और उस हवा में किसी पुराने युद्ध का शोर भी घुला हुआ-सा लगा। कुछ पल आंखें बंद कर खड़ा रहा, मानो समय ने मुझे पीछे खींच लिया हो।
किले से लौटते समय रास्ते में कुछ बच्चे पतंग उड़ा रहे थे। आसमान में रंगीन पतंगें और नीचे सदियों पुराना किला। यह दृश्य अलवर की आत्मा जैसा था, जहां अतीत और वर्तमान एक-दूसरे से टकराते नहीं, साथ चलते हैं। दोपहर बाद मैंने शहर के एक पुराने मोहल्ले में घूमते हुए कई हवेलियां देखीं, जिनकी खिड़कियां अब भी बाहर झांकती हुई लगती हैं, जैसे किसी के लौटने का इंतज़ार कर रही हों।
तीसरा दिन शहर से बाहर ले गया, प्रकृति की ओर। सुबह-सुबह मैं सरिस्का टाइगर रिज़र्व के लिए निकला। जैसे ही जंगल का इलाक़ा शुरू हुआ, शहर की आवाज़ें पीछे छूटने लगीं। यहां अरावली की पहाड़ियाँ और घने जंगल एक अलग ही संसार रचते हैं। जीप की धीमी गति के साथ-साथ मेरी सांसें भी धीमी हो गईं। सरिस्का केवल बाघों के लिए नहीं जाना जाता; यह एक मौन वन है, जहां हर पेड़, हर चट्टान और हर पगडंडी कुछ कहती जान पड़ती है। हमें बाघ तो नहीं दिखा पर हिरणों की फुर्ती, मोरों की आवाज़ और जंगल की गहरी शांति ने किसी कमी का अहसास नहीं होने दिया।
जंगल के भीतर एक प्राचीन मंदिर के अवशेष दिखे। वहां खड़े होकर लगा कि मनुष्य ने यहां भी आस्था और अस्तित्व के निशान छोड़े हैं। सरिस्का में समय अलग ढंग से बहता है। यहां घड़ी नहीं, धड़कन चलती है। लौटते समय मैंने महसूस किया कि अलवर को समझने के लिए केवल महल और किले काफी नहीं; उसके जंगल भी उतने ही ज़रूरी हैं।
शाम को वापस शहर पहुंचा तो मन में एक अजीब-सी तृप्ति थी। तीन दिन पहले देखा यह शहर अब अपरिचित नहीं रह गया था। अलवर ने मुझे शोर नहीं दिया, बल्कि ठहराव दिया। यह यात्रा किसी तेज़ रोमांच की नहीं थी; यह धीरे-धीरे भीतर उतरने वाली अनुभूति थी। यहां इतिहास किताबों में नहीं, गलियों और पहाड़ियों में सांस लेता है।
अलवर से विदा लेते समय मैंने आख़िरी बार पीछे मुड़कर देखा। अरावली की पहाड़ियां अब भी वहीं थीं। पूरी तरह से स्थिर, धैर्यवान और गुजरे हुए समय की साक्षी बनकर। मुझे लगा कि यह शहर उन लोगों के लिए है, जो केवल देखने नहीं, सुनने भी आते हैं। अलवर मेरी यात्रा-सूची में एक नाम भर नहीं रहा; यह अब मेरे भीतर एक शांत, गंभीर और भरोसेमंद स्मृति बन चुका था। ठीक वैसा ही, जैसा कोई पुराना दोस्त, जो ज़्यादा बोलता नहीं, पर हमेशा साथ खड़ा रहता है।
लेखक- संजय शेफर्ड
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