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कब है पोंगल, जानें तमिलनाडु के इस प्रमुख त्योहार की परंपरा और इसके संदेश

by Rakesh Pandey
Pongal
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स्पेशल डेस्क। Pongal: भारत में विभिन्न त्योहारों और उत्सवों की अपनी विशेष महत्ता हैं, जो विभिन्न प्रांतों में अपनी विशेषता के साथ मनाए जाते हैं। इसमें से एक है “Pongal।” यह तमिलनाडु का प्रमुख त्योहार है। पोंगल एक प्राचीन भारतीय त्योहार है जो सर्दी के मौसम के साथ ही सम्बंधित है और गर्मी के स्वागत का संकेत देता है। आइए जानते हैं की इस साल पोंगल कब हैं और इसकी विशेषताओं के बारे में विस्तार से समझेंगे।

Pongal का मतलब और महत्व

“पोंगल” का शाब्दिक अर्थ होता है “उभारना” या “उगाहन”। यह त्योहार खासकर धान की कटाई के समय मनाया जाता है और यह गतिविधि इस त्योहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पोंगल का मनाना सूर्य के उगमन की सूचना देता है और एक सुनहरे भविष्य की ओर संकेत करता है।

कब है Pongal?

तमिलनाडु के सर्वप्रमुख त्योहार पोंगल जनवरी के महीने में मनाया जाता है। इस त्योहार के दौरान लोग सूर्य की पूजा-अर्चना करते हैं और अपने घरों को नई ऊर्जा से भरते हैं। बता दें कि साल 2024 में पोंगल का त्योहार 15 जनवरी को मनाया जाएगा। 15 जनवरी से शुरू होकर यह 4 दिन तक चलेगा। पहले दिन को भोगी Pongal, दूसरे दिन को सूर्य पोंगल, तीसरे दिन माट्टु पोंगल और चौथे दिन को कन्नम पोंगल या कन्या पोंगल कहा जाता है। यह त्योहार मुख्य रुप से तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

Pongal के विभिन्न अवसर

Pongal का त्योहार चार दिन तक चलता है, जिसमें प्रत्येक दिन को अलग रूप से मनाया जाता है। पहले दिन “भोगि पोंगल” होता है, जिसमें लोग अपने घरों को सजाकर धन्यवाद अर्पित करते हैं। दूसरे दिन “सूर्य पोंगल” कहा जाता है, जिसमें सूर्य की पूजा होती है। तीसरे दिन “माटु पोंगल” कहा जाता है, जिसमें धान की कटाई के बाद उनका आभूषण किया जाता है। चौथे दिन “कानुम पोंगल” होता है, जिसे खासकर महिलाएं एक अद्वितीय रूप से इसे मनाती हैं।

Pongal की तैयारी और बाजारों की रौनक

पोंगल के दिन, लोग अपने घरों को सजाते हैं और रंग-बिरंगे कागजों से दीवारों पर आकृतियों को उकेरते हैं। बाजारों में भरपूर रौनक होती है और लोग नए कपड़े, गहने, और सामान खरीदते हैं। यह एक मेल-जोल का समय होता है जब लोग आपस में अपने खुशियों को बांटते हैं।

विविधताओं से भरा है यह त्योहार

Pongal के विशेष पर्व में विभिन्न रंग और धूमधाम से भरी गुजराती रीतियां शामिल हैं। इस त्योहार का मौसम भले ही धान की कटाई से जुड़ा हो, लेकिन इसके साथ ही साथ कई राजनीतिक, सांस्कृतिक, और सामाजिक महत्वपूर्ण पहलु भी होते हैं।

आदिकाल से आज तक: Pongal का इतिहास

पोंगल का इतिहास विशेष रूप से रोचक है। इसे आदिकाल से ही मनाया जाता रहा है। आज के आधुनिक युग में भी इस त्योहार का परंपरागत स्वरूप कायम है। यह त्योहार भारतीय कृषि समृद्धि को मनाने का एक अद्वितीय तरीका है जो समृद्धि और समृद्धि की आशा के साथ आता है।

धान की कटाई और धन्यवाद

पोंगल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है धान की कटाई का आयोजन, जिसमें लोग धन्यवाद अर्पित करते हैं। इस समय लोग अपने खेतों से लाए धान के बोझों को सजाकर सूर्य देवता की पूजा करते हैं। यह सांत्वना और आनंद का समय होता है जब लोग अपने मेहनत के फल का आनंद लेते हैं और उसे देवता की कृपा के रूप में स्वीकार करते हैं।

गुड़, गुज़्ज़क, और सजीवनी

पोंगल में बनाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के पुडिंग्स के भोग बनते हैं, जिनमें सर्दी के मौसम में गुड़, गुज़्ज़क, और सजीवनी मिश्रित होती हैं। यह समृद्धि, स्वास्थ्य, और खुशियों का प्रतीक होता है।

आत्मनिर्भरता और सामाजिक एकता की भावना

पोंगल का त्योहार आत्मनिर्भरता और सामाजिक एकता की भावना को बढ़ावा देता है। धान की कटाई के समय लोग मिल जुलकर काम करते हैं और समृद्धि की बढ़ती दिशा में एक-दूसरे को समर्थन देते हैं। इससे सामाजिक समृद्धि और सामूहिक विकास की प्रेरणा मिलती है।

पोंगल का आधुनिक स्वरूप

आधुनिक समय में, पोंगल का त्योहार और भी आकर्षक बन गया है। लोग सोशल मीडिया पर अपने त्योहार की तैयारियों की तस्वीरें शेयर करते हैं और अपने आदर्शों को प्रमोट करने का उत्साह दिखाते हैं। विभिन्न स्थलों पर पोंगल उत्सवों का आयोजन होता है जहां लोग खासकर समृद्धि और संजीवनी के रूप में धान के पुद्डिंग्स का आनंद लेते हैं।

पोंगल: एक पर्यावरण का उत्सव

पोंगल न केवल एक त्योहार होता है, बल्कि यह एक पर्यावरण का भी उत्सव है। धान की कटाई के बाद शेष रहने वाली स्ट्रॉ और बोझ बना हुआ कचरा उपयोग होता है और इसे खेतों में डाला जाता है। यह प्रथा पर्यावरण सजीव रखने का एक उदाहरण है और एक स्वच्छ और हरित पर्यावरण की दिशा में एक अद्वितीय पहलुओं को प्रमोट करती है।

राजनीतिक महत्व

पोंगल न केवल सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व का हिस्सा है, बल्कि इसका राजनीतिक महत्व भी है। कई बार इस त्योहार का आयोजन राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं में भी होता है, जिससे लोग एक दूसरे के साथ मिलकर सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक एकता का समर्थन करते हैं।

 

 

 

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