बॉलीवुड के गीतों में सदियों से भारतीय लोकसंगीत की झलक मिलती रही है, लेकिन यह कभी भी पूरी तरह से मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बना। शायद यही वजह भी है कि गायकों को भी दो भागों में अक्सर बांटा गया, एक बॉलीवुड और दूसरा फोक सिंगर। इस देश में भी शारदा सिन्हा की पहचान लोकगायिका के रूप में ही रही। ऐसा नहीं है कि बिहार की इस सुर कोकिला को बॉलीवुड से ऑफर्स नहीं मिले होंगे, लेकिन बावजूद इक्का-दुक्का गाने के बाद उन्होंने माटी से जुड़े गीतों को ही ज्यादा महत्व दिया। इस दूरी के बावजूद, इनके गाए गीत चार्टबस्टर बने और दर्शकों का दिल जीतते रहे।

शारदा सिन्हा : लोकसंगीत में अमिट छाप
शारदा सिन्हा ने भारतीय लोकसंगीत को नए मुकाम पर पहुंचाया। मैथिल, अवधी और भोजपुरी जैसी भाषाओं में गाने वाली शारदा जी ने बिहार की सांस्कृतिक विविधता और लोकभावनाओं को अपने सुरों में सजाया है। उनके गीतों ने बिहार की संस्कृति को देश के कोने-कोने तक पहुंचाया।
बॉलीवुड में उनकी शुरुआत ’मैंने प्यार किया’ के प्रसिद्ध गीत ‘कहे तोसे सजना’ से हुई। शारदा सिन्हा एक साक्षात्कार के दौरान इस गाने से जुड़ी कई दिलचस्प यादें साझा की थीं, जो उनके इस गीत के सफर को और भी खास बना देती हैं।
मात्र 75 रूपये में गया गया ‘कहे तोसे सजना’ कैसे बना एक ऐतिहासिक गीत
शारदा सिन्हा के इस गीत का किस्सा बेहद अनूठा है। उन्होंने महाकवि विद्यापति के गीतों का एक एल्बम रिकॉर्ड किया था जिसका नाम था ‘श्रद्धांजलि : ए ट्रिब्यूट टू मैथिल कोकिल विद्यापति’।” इस एल्बम की लोकप्रियता ने तरुण बड़जात्या जैसे व्यक्तित्व को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने शारदा सिन्हा को पत्र लिखकर इस एल्बम के कैसेट की कमी के बारे में बताया।
शारदा जब किसी रिकॉर्डिंग के सिलसिले में बॉम्बे गईं, तो उनकी मुलाकात बड़जात्या परिवार से हुई, जहां संगीतकार राम-लक्ष्मण को उनके साथ रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया गया था। राम-लक्ष्मण ने शारदा जी की गायकी से प्रेरित होकर ‘कहे तोसे सजना’ की धुन तैयार की और फिर शारदा सिन्हा को रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया गया।
एक इंटरव्यू के दौरान शारदा जी ने बताया था कि वह सोचती थी कि इस फिल्म के बाकी गाने लता जी गा रही हैं, तो मेरा ये फोक गाना कौन सुनेगा। लेकिन आज भी हर मंच पर ‘कहे तोसे सजना’ की फरमाइश आती है।” इस गाने ने न सिर्फ उन्हें बल्कि भारतीय लोकसंगीत को भी अमर बना दिया। हालांकि हैरानी की बात यह है कि इस गाने के लिए उन्हें मात्र 75 रूपये मिले थे, जबकि इस सुपरहिट फिल्म से जुड़े सभी कास्ट की पेमेंट लाख रुपए तक थी।
शारदा सिन्हा की कला और बॉलीवुड से दूरी का कारण
शारदा सिन्हा के पास बॉलीवुड में कई मौके थे, लेकिन उन्होंने हमेशा अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति को प्राथमिकता दी। यहां तक कि राजकपूर जी ने ‘राम तेरी गंगा मैली’ के लिए उन्हें आमंत्रित किया था। शारदा जी के अनुसार, “पारिवारिक मजबूरी के कारण वह यह अवसर नहीं ले सकीं और इसका मलाल उन्हें जिंदगीभर रहा।” शारदा सिन्हा ने बिहार की धरती पर रहकर लोकसंगीत की सेवा करना ज्यादा जरूरी समझा।
बॉलीवुड में लोकसंगीत की अहमियत
शारदा सिन्हा का मानना था कि बॉलीवुड में लोकसंगीत हमेशा जीवंत रहेगा। वे कहती थीं, “जिन म्यूजिक डायरेक्टर्स ने लोकसंगीत का इस्तेमाल किया, उनकी फिल्में सुपरहिट रही हैं। फोक म्यूजिक के बिना बॉलीवुड का संगीत अधूरा है।” ऐसे कई संगीतकार रहे हैं जिन्होंने भारतीय लोकधुनों को आधार बनाकर अनगिनत हिट गाने दिए हैं।
लोकसंगीत की शक्ति और उसकी महत्वता
बॉलीवुड भले ही मुख्यधारा में लोकसंगीत को हमेशा स्थान न दे पाया हो, लेकिन शारदा सिन्हा जैसे कलाकारों ने लोकधुनों की मिठास को हर भारतीय के दिल में जगह दिलाई है। उनके गाए गीत आज भी हर मंच पर धूम मचा रहे हैं और यह साबित करते हैं कि भारतीय सिनेमा में लोकसंगीत की अहमियत कभी कम नहीं हो सकती।

