Gumla (Jharkhand) : सरकारें भले ही विकास के लाख दावे कर लें। लेकिन, सच्चाई तो यह है कि दूधिया रोशनी की चकाचौंध भरे शहरों व आसपास के इलाकों को छोड़ सुदूरवर्ती गांव न सिर्फ जिला मुख्यालयों से काफी दूर हैं, बल्कि दुर्गम भी हैं। इन गांवों में रहनेवाले आज भी मूलभूत सुविधाओं तक के लिए तरह रहे हैं। ऐसे ही अभावग्रस्त गांव का एक उदाहरण है गुमला जिले के घाघरा प्रखंड के सुदूरवर्ती दीरगांव पंचायत का झलकापाट गांव। इस गांव की एक 30 वर्षीय गर्भवती प्रसव पीड़ा से कराहती रही, लेकिन समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकी। परिजनों व ग्रामीणों के सहयोग से पहुंची भी, तो नियति ने साथ नहीं दिया और अंततः उसकी मौत हो गई।

बहंगी में करीब एक किलोमीटर तक पैदल ले गए परिजन
मानवता को झकझोर देने वाला यह वाक्या रविवार का है। यह वाक्या न सिर्फ ग्रामीण जीवन की जद्दोजहद का परिचायक माना जा रहा है, बल्कि इसने सरकारी व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। सड़क के अभाव में प्रसव पीड़ा से कराहती गर्भवती सुकरी कुमारी को परिजनों ने बहंगी (डोली) में लादकर करीब एक किलोमीटर पैदल काड़ासिल्ली गांव तक पहुंचाया। उसके बाद ममता वाहन की सहायता से महिला को घाघरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए सदर अस्पताल रेफर कर दिया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
सड़क के अभाव में हर प्रयास विफल
परिजनों के अनुसार रविवार की सुबह करीब 11 बजे सुकरी कुमारी को तेज प्रसव पीड़ा शुरू हुई। झलकापाट गांव तक पक्की सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस या अन्य चारपहिया वाहन गांव नहीं पहुंच सके। मजबूरी में ग्रामीणों ने खुद झिलगी तैयार की और उबड़-खाबड़, पथरीले रास्ते से महिला को कंधों पर उठाकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। इस दौरान परिजन लगातार मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन सड़क के अभाव ने हर प्रयास को सीमित कर दिया।
स्वास्थ्य व्यवस्था और बुनियादी ढांचे की पोल खुली
ग्रामीणों ने बताया कि झलकापाट गांव पूरी तरह पठारी और दुर्गम इलाके में बसा है। बरसात के मौसम में हालात और भी भयावह हो जाते हैं। ऐसे में बीमार, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाना जान जोखिम में डालने जैसा होता है। कई बार इसी तरह की परिस्थितियों में लोगों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस घटना ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था और बुनियादी ढांचे की पोल खोल दी है।
आजादी के 78 वर्ष बाद भी सड़क नहीं
ग्रामीणों ने बताया कि घाघरा प्रखंड मुख्यालय से यह गांव लगभग 30 किलोमीटर दूर है। लेकिन, विकास की दूरी इससे कहीं अधिक नजर आती है। क्योंकि, आजादी के करीब 78 वर्ष बाद भी झलकापाट गांव सड़क जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित है। सड़क नहीं होने की वजह से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार तक पहुंच बेहद कठिन हो गया है। कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की गई, बावजूद अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला। ग्रामीणों ने प्रशासन से अविलंब झलकापाट गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने की मांग की है।

