RANCHI: झारखंड हाईकोर्ट ने पत्नी की हत्या से जुड़े एक पुराने मामले में सुनवाई के दौरान निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और संदेह का लाभ देते हुए दोनों आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया। यह फैसला शुक्रवार को न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की खंडपीठ ने सुनाया है। हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद नहीं है। अदालत ने माना कि प्रस्तुत साक्ष्य इतने मजबूत नहीं हैं कि उनके आधार पर दोषसिद्धि को बरकरार रखा जा सके। अदालत ने दो टूक कहा कि आपराधिक मामलों में केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

2003 के फैसले के खिलाफ की गई थी अपील
यह अपील शत्रुघन प्रसाद डांगी और धानु भुइयां द्वारा हजारीबाग की आठवीं अपर सत्र अदालत के वर्ष 2003 के फैसले के खिलाफ दायर की गई थीं। ट्रायल कोर्ट ने दोनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। बता दें कि मामला वर्ष 2000 का है, जब शत्रुघन प्रसाद डांगी की पत्नी उषा देवी की हत्या कर दी गई थी। प्रारंभिक जांच में पुलिस ने इसे लूटपाट के दौरान हुई हत्या बताया था। लेकिन बाद में पति पर साजिश रचकर हत्या करवाने का आरोप लगाया गया और धानु भुइयां को भी इस मामले में साथ देने का आरोपी बनाया गया।
कोर्ट ने पाया कि सह-आरोपित धानु भुइयां के खिलाफ कोई स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है। केवल सह-आरोपित के स्वीकारोक्ति बयान के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता। इसके अलावा कथित हत्या में प्रयुक्त चाकू को न तो एफएसएल जांच के लिए भेजा गया और न ही यह साबित किया गया कि उसी हथियार से हत्या हुई थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक तनाव मात्र हत्या का निर्णायक आधार नहीं हो सकता। चूंकि दोनों आरोपी पहले से जमानत पर थे, इसलिए उन्हें जमानत बंधन से भी मुक्त कर दिया गया।

