Jharkhand Bureaucracy : घर की लाइब्रेरी में लगी टेबल लाइट की हल्की-हल्की रोशनी पूरे कमरे में फैली थी। गुरु शेर-ओ-शायरी की किताब लिए बैठे थे। गुरु का किताबों से प्रेम बिल्कुल वैसा ही है, जैसा नई उम्र में प्रेमी-प्रेमिकाओं का होता है। जब समय मिले, गुरु अपनी ‘प्रेम गली’ में पहुंच जाते हैं। वैसे तो लोगों के बीच रहना पसंद है, लेकिन जब एकांत महसूस करते हैं तो किताबों की दुनिया से हो आते हैं। गुरु की लाइब्रेरी में जाने की अनुमति कम लोगों को है। अधिकतर को द्वारपाल ही निपटा देते हैं।

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अपनी बात थोड़ी जुदा है। साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते बेरोकटोक आना-जाना रहता है। बहरहाल, पुस्तकालय में गुरु ‘फ़ैज़’ पर नजर गड़ाए हुए थे। अभिवादन से थोड़े सजग हुए। बोले, आओ बैठो, तुमको ‘फ़ैज़’ सुनाते हैं। गुरु शुरू हो गए। कहा- प्रोफ़ेसर मुहम्मद हसन ने लिखा है कि – फ़ैज़ को ज़िंदगी और सुंदरता से प्यार है- भरपूर प्यार। बात सुनकर लगा, गुरु कहीं अध्ययन-मनन के लंबे सफर पर न निकल जाएं। लिहाजा, बिना खलल डाले बस राह बदलने के लिए विनम्र निवेदन किया- फ़ैज़ के एकाध शेर सुनाइए गुरु…। गुरु बोले- सुनो, ‘वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था,
वो बात उनको बहुत ना-गवार गुज़री है…।
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पुराने अनुभव के आधार पर बतौर श्रोता, तीन-चार बार वाह…वाह… कह दिया। गुरु यह सुन कर हंसने लगे। देखा तो पूछ लिया- ‘क्या हुआ गुरु, कोई गलती हो गई क्या?’ गुरु बोले- अरे नहीं! इस शेर से एक बात याद आ गई, इसलिए हंस पड़ा। गुरु की बात से लगा ‘बात’ अपने काम की हो सकती है। सो, बिना देर किए अनुरोध किया, कृपा करके सुना दीजिए। संभव हो तो बता दीजिए। गुरु हंसते हुए बोले, बताई-सुनाई जा सके या नहीं, समझाई जरूर जा सकती है। गुरु ने समझाना शुरू किया। कहा- वनांचल के नौकरशाही वाले मुहल्ले की फिजाओं में जब से मदहोशी वाली महक फैली है, कई गलियां वीरान-सी हो गई हैं।
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ऐसे माहौल में एक ‘साहब’ को एक बात बड़ी ना-गवार गुजरी है। फ़ैज़ का जिक्र होते ही ‘साहब’ का चेहरा सामने आ गया। इसलिए हंसी छूट गई। बताने वाले बता रहे हैं कि शोले वाले रामगढ़ में कमोबेश यही आलम है। सुना है, जब से इलाके के ‘इमाम’ गब्बर की किलेबंदी देखकर लौटे हैं, बुझे-बुझे से हैं। फ़ैज़ वाली फीलिंग महसूस नहीं कर पा रहे। फाइलों का फलसफा तक नहीं देख रहे। अनमने भाव से फॉरवर्ड का फॉर्मेट अपनाए हुए हैं। दरअसल, बताने वाले बता रहे हैं कि मियां शायर का दिल टूट-सा गया है।
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सोचा नहीं था, जिससे वफ़ा की उम्मीद पाले बैठे थे, वह इस कदर बेवफ़ा निकल जाएगा। ‘इस्लाम’ में ईमान पर बड़ा जोर है। अगर कोई ‘ईमान’ पर ही सवाल खड़ा कर दे तो फिर कौन अपना-कौन पराया? गुरु की बात से एक बात साफ हो गई थी। मधुशाला से जुड़ी कहानियों का शोर भले मंद पड़ रहा हो। साइड इफेक्ट खत्म नहीं हुआ है। गाहे-बगाहे दिल में एक टीस-सी उठ रही है। फ़ैज़ के शब्दों में कहें तो…
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा,
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा…।
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शेर पूरा करते हुए गुरु ने किताब फिर अलमारी में रख दी। बोले- चलो चाय पिलाते हैं। गुरु कमरे से आगे-आगे निकले और अपने कदम पीछे-पीछे। पूछने की इच्छा और थी, लेकिन गुरु के खिन्न होने का खतरा था। लिहाजा, मौन साध कर मन को मनाया और सारी जानकारी मस्तिष्क के
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