रांची। झारखंड में लोकायुक्त, सूचना आयुक्त समेत कई महत्वपूर्ण संवैधानिक और वैधानिक पद लंबे समय से खाली पड़े रहने पर झारखंड हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। बुधवार को इन रिक्त पदों पर नियुक्ति की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने राज्य सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए।
बुधवार को इन रिक्त पदों पर नियुक्ति को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने राज्य सरकार की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए स्पष्ट कहा कि चार साल से अधिक समय तक इन महत्वपूर्ण संस्थाओं को निष्क्रिय रखना गंभीर मामला है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा- ऐसी महत्वपूर्ण संस्थाओं को निष्क्रिय रखना बेहद गंभीर मामला
अदालत ने स्पष्ट कहा कि चार साल से अधिक समय तक लोकायुक्त और सूचना आयोग जैसी संस्थाओं को निष्क्रिय रखना बेहद गंभीर मामला है। लोकायुक्त जैसी संस्था का गठन भ्रष्टाचार की शिकायतों की निगरानी, जांच और जवाबदेही तय करने के उद्देश्य से किया जाता है। यदि यह पद लंबे समय तक खाली रहे तो शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों प्रभावित होती हैं।
वहीं सूचना आयुक्त की भूमिका भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में बेहद अहम है। सूचना का अधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन, सरकारी विभागों से सूचना उपलब्ध कराने की व्यवस्था को मजबूत करने और आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में सूचना आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में इन पदों का रिक्त रहना जनता के अधिकारों पर प्रतिकूल असर डालता है।
केवल प्रक्रिया जारी रहने की बात कहने से काम नहीं चलेगा, ठोस परिणाम बताएं
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि लोकायुक्त सहित अन्य रिक्त पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है और जल्द इसे पूरा कर लिया जाएगा। हालांकि अदालत इस जवाब से संतुष्ट नहीं दिखी। कोर्ट ने कहा कि केवल प्रक्रिया जारी होने की बात कहने से काम नहीं चलेगा, सरकार को ठोस परिणाम दिखाने होंगे।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभय कुमार मिश्रा ने अदालत को बताया कि सरकार लंबे समय से नियुक्ति प्रक्रिया का हवाला देती आ रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस प्रगति सामने नहीं आई है। इस पर हाई कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि शीघ्र सभी रिक्त पदों को भरते हुए संबंधित संस्थाओं को सक्रिय किया जाए। अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि यदि समय रहते नियुक्तियां नहीं हुईं तो वह कड़े आदेश पारित करने के लिए स्वतंत्र होगी।

