रांची। रांची समेत पूरे झारखंड में प्रकृति पूजा का प्रमुख पर्व सरहुल धूमधाम और पारंपरिक आस्था के साथ मनाया जा रहा है। इस अवसर पर सरना स्थलों पर विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया गया, जहां प्रकृति, पूर्वजों और देवताओं का आवाहन किया गया।
राजधानी के सरना स्थल पर मुख्य पाहन जगलाल पाहन ने दो घड़ों में रखे जल के स्तर को देखकर इस वर्ष अच्छी बारिश और बेहतर फसल होने की भविष्यवाणी की।
अलग-अलग रंगों के मुर्गे की दी गई बलि
पूजा के दौरान अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार विभिन्न रंगों के मुर्गों की बलि दी गई। सफेद मुर्गा सिंगबोंगा, रंगवा जल देवता, रंगली पूर्वजों और काला मुर्गा अनिष्ट शक्तियों की शांति के लिए अर्पित किया गया।
अनुष्ठान के बाद घड़े के जल से पाहन को स्नान कराया गया और उनके चरण धोए गए। इसके पश्चात उन्होंने पूरे विश्व में सुख-शांति, समृद्धि और प्रकृति संतुलन की कामना की।
आदिकाल से चली आ रही परंपरा
पाहन ने बताया कि यह परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है, जब आदिवासी समुदाय प्रकृति के संकेतों के आधार पर मौसम का अनुमान लगाता था। आज भी यह परंपरा उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
उन्होंने बताया कि सरहुल पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन उपवास रखा जाता है और खेतों व जल स्रोतों से केकड़ा और मछली पकड़ी जाती है। मान्यता है कि बोआई के समय केकड़े से जुड़े अनुष्ठान करने से फसल अच्छी होती है और पैदावार बढ़ती है।
इनकी रही मौजूदगी
इस अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन, बबलू मुंडा, दीपक हेमरोम, रौशन हेमरोम, कुलदीप हेमरोम और अंतो हेमरोम सहित अन्य लोग शामिल थे।

