रांची : भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद अब बाबूलाल मरांडी के सामने पहली चुनौती के रूप में सामने आ रहा है डुमरी विधानसभा उपचुनाव। गिरिडीह जिले में डुमरी विधानसभा सीट झामुमो विधायक और शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो के निधन की वजह खाली चल रही जगन्नाथ महतो झामुमो के बड़े नेताओं में थे। ऐसे में डुमरी विधानसभा सीट इस राज्य की महत्वपूर्ण विधानसभा सीट है।

2019 में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने दर्ज की थी जीत
इस सीट पर विगत 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने जीत दर्ज की थी। 2019 में डुमरी में कुल 37.38 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2019 में झारखंड मुक्ति मोर्चा से जगरनाथ महतो ने अाजसू पार्टी की प्रत्याशी यशोदा देवी को 34288 वोटों के अंतर से हराया था। अब इस सीट पर उपचुनाव कराया जाना है। यह उपचुनाव झामुमो के साथ ही भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी के लिए भी बेहद अहम होगा।
झामुमो प्रत्याशी होंगी जगरनाथ महतो की पत्नी बेबी
इस सीट से झामुमो जगरनाथ महतो की पत्नी बेबी देबी को चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी में है। वहीं एनडीए की ओर से उम्मीद्ववार अभी तय नहीं है। भाजपा इस सीट पर खुद चुनाव लड़ेगी या आजसू को यह सीट देगी यह भी अभी तक स्पषट नहीं है। लेकिन उम्मीद्वार एनडीए के किसी भी पार्टी का हो उसे जिताने की जिम्मेदारी भाजपा व बाबूलाल मरांडी पर ही होगी।
अब तक उपचुनाव में झामुमो रहा आगे
हेमंत राज में झारखंड में विधानसभा का पांचवां उपचुनाव डुमरी में होने जा रहा है। अब तक हुए चार उपचुनाव में जेएमएम के नेतृत्व वाले गठबंधन को एक सीट गंवानी पड़ी है। इसके पहले दुमका, मधुपुर, बेरमो और रामगढ़ में उपचुनाव हुए। रामगढ़ में बीजेपी और आजसू ने साझा उम्मीदवार उतारा। गिरिडीह के सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी की पत्नी एनडीए की प्रत्याशी थी। उन्हें सफलता मिल गई थी। वैसे भी रामगढ़ सीट पारंपरिक तौर पर आजसू की ही रही है। दुमका और बरहेट सीटों से जेएमएम नेता और अभी झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन खुद खड़े हुए थे। दोनों जगह से जीत गए थे। उन्होंने दुमका सीट छोड़ी तो उपचुनाव में यह सीट फिर जेएमएम के खाते में गयी।
क्या दोहराई जाएगी हफीजुल की कहानी
मधुपुर सीट से हाजी हुसैन अंसारी जेएमएम के टिकट पर जीते थे। उनके निधन के बाद उनके बेटे हफीजुल को जेएमएम ने टिकट दिया। वे भी जीत गए थे। जगरनाथ महतो की पत्नी की तरह ही हफीजुल को भी चुनाव से पहले ही मंत्री बना दिया गया था। बेरमो सीट से कांग्रेस के राजेंद्र सिंह जीते थे। उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके बेटे ने बेरमो पर कब्जा बरकरार रखा।
बाबूलाल पर साझा उम्मीद्वार उतारने की चुनौती
डुमरी उपचुनाव में बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी के लिए चुनौती है कि साझा उम्मीदवार उतार कर इस सीट को एनडीए के खाते में डालें। अगर डुमरी 2019 विधानसभा चुनाव की बात करें तो इसमें जेएमएम के टिकट पर लड़े जगरनाथ महतो 71,128 वोट लेकर विजयी घोषित हुए थे। बीजेपी उम्मीदवार को 36013 वोट मिले थे, जबकि आजसू पार्टी के प्रत्याशी को 36840 वोट मिले थे। लेकिन अब आजसू व बीजेपी साथ हैं।
लोकसभा सीट पर है आजसू का कब्जा
गिरिडीह लोकसभा की सीट भी अभी आजसू के कब्जे में है। डुमरी सीट गिरिडीह संसदीय क्षेत्र के तहत ही आती है। अगर दोनों का साझा उम्मीदवार हुआ तो जेएम को नुकसान हो सकता है। साल 2019 के वोटों को देखें तो आजसू और बीजेपी को मिले वोट 72 हजार से अधिक होते हैंए जबकि जगरनाथ महतो करीब 71 हजार वोटों से ही जीते थे। ऐसे में अगर बाबूलाल मरांडी संयुक्त उम्मीदवार देने में कामयाब होते हैं तो सीट यहां एनडीए के जीत की संभावना अधिक हो जाएगी।
डुमरी में 1977 से एक ही जाति का प्रतिनिधित्व
डुमरी विधानसभा क्षेत्र की अगर बात करें तो यह दो जिलों के तीन प्रखंडों में बंटा हुआ है। इसमें गिरिडीह जिला के डुमरी और बोकारो जिला के नावाडीह और चन्द्रपुरा के नौ पंचायत शामिल है। अगर इस विधानसभा क्षेत्र को जाति के नजरिए से देखें तो 1977 से कुर्मी जाति और डुमरी प्रखंड से बाहर के लोग विधायक रहे हैं। 1977 से पहले हुए परिसीमन में डुमरी के साथ नावाडीह और चन्द्रपुरा की नौ पंचायतों को जोड़ दिया गया। तब से डुमरी का कोई भी व्यक्ति यहां से विधायक नहीं बन सका।
जानिए यहां से अब तक विधानसभा चुनाव में जीते प्रत्याशियों के बारे में
सबसे पहले 1952 में कांग्रेस पार्टी के बी सहाय, 1957 और 1962 में राज पार्टी से हेमलाल परगनैत, 1967 में राज पार्टी से राजमाता एस मंजरी, 1969 में मध्यावधि चुनाव हुआ और राज पार्टी से केपी सिंह जो एकीकृत बिहार में पी डब्ल्यूडी मंत्री बने और जीते। 1972 में कांग्रेस से मुरली भगत विधायक बने।
1977 में जनता पार्टी से लालचंद महतो, 1980 में मध्यावधि चुनाव हुआ और पहली बार झामुमो से शिवा महतो चुनाव जीते। 1985 में शिवा दूसरी विधायक चुने गए। 1990 में लालचंद महतो जनता दल से चुनाव लड़े और सीट को एक बार फिर से हथिया लिया। 1995 में झामुमो से शिवा तीसरी बार चुनाव जीतकर डुमरी से विधायक चुने गए। 2000 में लालचंद महतो जदयू से चुनाव लड़े और विधायक बने। और राज्य अलग होने के बाद प्रदेश के पहले ऊर्जा मंत्री बने।
2005 में झामुमो से जगरनाथ महतो पहली बार विधायक बने। और 2009 व 2014 में चुनाव जीत कर हैट्रिक लगाई। इसके बाद यह सीट झामुमो का गढ़ बन गया। ऐसे में 2019 में झामुमो से जगरनाथ महतो, जदयू से लालचंद महतो, बीजेपी से प्रदीप साहू, डुमरी से दो बार चुनाव लड़ चुके दिवंगत नेता दामोदर महतो की पत्नी व डुमरी प्रमुख यशोदा देवी, आजसू पार्टी से डुमरी में सेंध लगाने को चुनावी समर में उतरे।
इस चुनाव में भी जगरनाथ महतो की जीत हुई। लेकिन अब जगरनाथ महतो के निधन की वजह से यह सीट खाली हो गई है। ऐसे में देखना होगा की अब किस पार्टी और किस प्रत्याशी का डंका बजने जा रहा है।
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