पोरबंदर: गुजरात के पोरबंदर जिले की अदालत ने पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को 1997 के हिरासत में यातना मामले में बरी कर दिया है। अदालत ने उन्हें आरोप-मुक्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष इस मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा।
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मुकेश पंड्या ने शनिवार को यह फैसला सुनाया, जिसमें उन्होंने भट्ट को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 330 (जुर्म कबूल करवाने के लिए शारीरिक चोट पहुंचाना) और धारा 324 (खतरनाक हथियारों से चोट पहुंचाना) के तहत बरी कर दिया। अदालत ने यह माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में असफल रहा और इसने भट्ट को संदेह का लाभ देते हुए उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि मामले में आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं, और भट्ट पर मुकदमा चलाने के लिए जरूरी मंजूरी भी प्राप्त नहीं की गई थी, जबकि वह उस समय एक लोक सेवक के तौर पर अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे थे।
यह मामला 1997 में पोरबंदर में हुई एक घटना से जुड़ा है, जिसमें संजीव भट्ट पर आरोप था कि उन्होंने एक व्यक्ति, नारन जादव, को शारीरिक और मानसिक यातना दी थी। जादव की शिकायत के अनुसार, भट्ट ने उसे और उसके बेटे को गंभीर चोटें पहुंचाई थीं, ताकि वह एक अपराध कबूल कर सके। जादव, जो 1994 के हथियार बरामदगी मामले में आरोपी था, ने 1997 में भट्ट पर आरोप लगाया कि उन्हें पोरबंदर के पुलिस थाने में बिजली के झटके दिए गए थे।
अदालत ने यह भी माना कि भट्ट पर मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक मंजूरी नहीं ली गई थी, जो कि एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान था। इस मामले के बारे में शिकायत 6 जुलाई 1997 को मजिस्ट्रेट कोर्ट के समक्ष दर्ज हुई थी, और अदालत ने 2013 में भट्ट के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था।
इससे पहले, संजीव भट्ट को 1990 में जामनगर के हिरासत में एक व्यक्ति की मौत के मामले में आजीवन कारावास की सजा और 1996 में राजस्थान के एक वकील को फंसाने के लिए ड्रग्स रखने के मामले में 20 साल की सजा सुनाई गई थी। वर्तमान में वह राजकोट सेंट्रल जेल में बंद हैं।
हालांकि इस निर्णय से भट्ट को बड़ी राहत मिली है, लेकिन उनका विवादों से घिरा हुआ करियर और अन्य मामलों में सजा की प्रक्रिया उनके खिलाफ चल रही है। इस फैसले के बावजूद, भट्ट का कानूनी संघर्ष जारी रहेगा, और उनकी स्थिति में जल्द कोई बड़ा बदलाव आना कठिन है।
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