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कोटा में आत्महत्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, बच्चों की आत्महत्या के लिए कोचिंग सेंटर्स व उसके माता-पिता ही जिम्मेदार

by Rakesh Pandey
Chief Justice
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नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने कोटा सुसाइड मामले में एक महत्वपूर्ण टिपण्णी दी है, जिसमें उन्होंने बच्चों के माता-पिता को उनकी आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया है। कोटा में हो रहे इस चिंताजनक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चे खुदकुशी के रास्ते पर चलते हैं, इसमें केवल उनके माता-पिता ही जिम्मेदार हैं।

माता-पिता की जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों की इच्छा न जानने तथा अपनी चाहत की वजह से खुदकुशी के कदम उठाने की भारी प्रवृत्ति देखने के बाद यह जिम्मेदारी माता-पिता की है। कोर्ट ने उनके आत्महत्या की वजह को उनके माता-पिता की अधीनता को ठहराया है और उन्हें बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल का सख्ती से पालन करने के बारे में भी बात कही है।

खुदकुशी के प्रेरणा स्रोत

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया कि बच्चे खुदकुशी के प्रेरणा स्रोत बनते हैं जब माता-पिता उन्हें अपनी इच्छाओं की वजह से अत्यधिक प्रत्याशा रखते हैं और उनसे अधिक कुशलता की उम्मीद करते हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गलती कोचिंग संस्थानों की नहीं, बल्कि पूर्ण रूप से माता-पिता की है, जिन्होंने अपने बच्चों से उनकी सीमाओं से बढ़कर उम्मीदें रखी हैं।

बच्चों के लिए कोचिंग सेंटर्स पर सुप्रीम कोर्ट का इनकार

इस टिप्पणी के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कोचिंग सेंटर्स पर लगाम लगाने से इनकार किया है और उन्हें जिम्मेदार ठहराया है। कोर्ट ने कहा है कि छात्रों को एक बेहतरीन और सकारात्मक माहौल देना चाहिए जिससे बढ़ावा मिलने में मदद मिलती है। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए न्यायिक दलों, सरकार, और समाज को मिलकर कठिनाईयों का सामना करना होगा।

बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य के लिए कदम

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित करने का आदान-प्रदान किया है कि बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल हो, और उन्हें आत्म-समर्थन और आत्म-समझ की शिक्षा दी जाए। ऐसा करने से वे अपनी दुनिया को सही दृष्टिकोण से देख सकते हैं और सही निर्णय ले सकते हैं।

इतिहास का मुद्दा

इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का यह रुख महत्वपूर्ण है, क्योंकि इतिहास ने दिखाया है कि बच्चों को अत्यधिक प्रत्याशा और दबाव के बीच माता-पिता की उम्मीद बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। समाज में बच्चों को सिर्फ भारी भरकम शैक्षिक दबाव में डालना, उन्हें अत्यधिक प्रत्याशा का सामना करने पर बुरा असर डाल सकता है। ऐसे माहौल में, बच्चों की समर्थन शक्ति को मजबूत करना और उन्हें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सही जानकारी देना हम सभी की जिम्मेदारी है।

शिक्षकों और अभिभावकों की भूमिका

इस मामले में शिक्षकों और अभिभावकों की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण है। शिक्षकों को छात्रों की चिंता को समझने और उन्हें उनके लक्ष्यों की प्राप्ति में मदद करने का कार्यक्षेत्र मिलना चाहिए। वे छात्रों के साथ सकारात्मक संवाद में रहें ताकि छात्र अपनी परेशानियों को बांट सकें। अभिभावकों को भी अपने बच्चों के साथ संवाद में रहने का समय निकालना चाहिए ताकि उन्हें अगर कोई समस्या है, तो वह सही मार्गदर्शन कर सकें।

नई दिशा की आवश्यकता

इस मामले में नई दिशा की आवश्यकता है जिसमें हम समाज में शिक्षा और करियर की दृष्टि से हानि होने पर बच्चों को नकारात्मक दबाव नहीं डालने दें। कोर्ट ने यह भी कहा की समाज को बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए थोड़ा सजग होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने हमें यह याद दिलाया है कि हमारे समाज में बच्चों को देने वाले दबाव को कम करना हम सभी की जिम्मेदारी है। बच्चों की सोच, उनकी भावनाएं और उनका मानसिक स्वास्थ्य हमारे समाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं और हमें इसे सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करना होगा।

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