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Hindi Poetry : एक दिन

by Vivek Kumar Shukla
Hindi Poetry
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एक दिन तारे जब चुपचाप सो जाएँगे
चाँद तुम्हारी बालों में उलझा ऊँघेगा
फूल वूल सारे ताकेंगे राह तुम्हारी
तब पूछूँगा मैं पृथ्वी से
क्यों घूमती थकती रहती हो?
बंद करो ये दिन रात बनाना
जब हर दिन उस बिन रात ही है
कह दो सूरज से भी यार !
खोल दे अपने घोड़े
क्या सावन क्या जेठ दुपहरिया
जब वो ही नहीं साथ हमारे

एक दिन लिखेंगे कविता

एक दिन लिखेंगे कविता
कविताएँ सब ख़त्म हो गयी हैं
कि लिखनी थी एक तुम पर
देर रात तुम्हें फ़ोन करना था
कि क्या कहें
कि वही तुमसे प्यार है वग़ैरह
तुम्हें फ़ोन करेंगे एक दिन
जब खोज लेंगे भाषा में एक शब्द
उजला तुम्हारी मुस्कान सा
और काला इस अंधेरे सा
जो घिर आता है
जब शब्द ख़त्म हो जाते हैं
और तुम दूर

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