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शहरनामा : आई मिलन की बेला

by Birendra Ojha
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ह किसी फिल्म का नाम भर नहीं है, हकीकत है। इस लौहनगरी में ही नहीं, पूरे देश में दीवाली मिलन, दशहरा मिलन और उससे बढ़कर होली मिलन का क्रेज सिर चढ़कर बोलता है। जिन्हें मिलन समारोह करने की आदत है, वे तो एक साल से इसकी तैयारी में जुट जाते हैं। कौन से गायक को बुलाना है, कार्यक्रम कहां करना है, आइटम क्या-क्या होगा। और सबसे अंत में बात होती है कि माला कौन उठाएगा। माला यानी खर्चा-पानी। आयोजक यदि बड़े अधिकारी या बड़े जनप्रतिनिधि हैं तो माला उठाने वालों की कतार लग जाती है। ठेकेदारों की जमात इस बात की पैरवी लगाने लगते हैं कि एक बार उसे सेवा का अवसर प्रदान किया जाए। खैर-तबीयत आदि देखकर माला उठाने वाले का नाम तय कर दिया जाता है। जैसे ही घोषणा होती है, वह बल्लियों उछल जाता है। फिर कानाफूसी करके इसका प्रचार करा देता है।

बहुत काम का बांस

बांस वैसे तो जंगल-पहाड़ में उगने वाला वनस्पति है, लेकिन यह बहुपयोगी कृषि उत्पाद है। शादी-ब्याह से लेकर रामनवमी आदि त्योहार तो इसके बिना हो ही नहीं सकते। यह नाम तब भी खूब सुनने में आता है, जब कोई बांस लगाकर ठेका पा जाता है, नौकरी में प्रोन्नति मिल जाती है। इन्हीं सब विधि-विधान में उल्टे बांस बरेली के… भी सुनने को मिल जाता है। बांस से इतने सारे अनुष्ठान कैसे संपन्न हो जाते हैं, यह शोध का विषय हो सकता है।
हम यहां बात कर रहे हैं, ट्रैफिक व्यवस्था की। थर्ड मार्च से दो माह पहले जुबिली पार्क की सड़क इसी बांस के सहारे बंद कर दी गई, जिससे उन लोगों पर आफत का पहाड़ टूट पड़ा, जो सड़क किनारे बाइक या कार लगाकर अकेले-दुकेले या सपरिवार पार्क की खूबसूरती का नजारा लेते हैं। अब इसी बांस की बैरिकेडिंग काशीडीह रोड पर दिख रही है।

बस एक फ्लाईओवर चाहिए

अपने शहर में अपती तरह के पहले फ्लाईओवर का काम द्रुत गति से चल रहा है। पहला इसलिए, क्योंकि इस पर से आम लोग भी अपने दोपहिया-चारपहिया वाहन लेकर गुजर सकेंगे। अब तक जो फ्लाईओवर बने हैं, उसे कंपनी ने अपनी माल ढुलाई के लिए बनाया है। बर्मामाइंस, जुगसलाई और साकची में ऐसा ही फ्लाईओवर है, जिस पर ट्रक-डंपर गुजरते हुए लोग टकटकी लगाकर देखते हैं। इसी तरह का एक फ्लाईओवर बनाने की मांग मेरीन ड्राइव गोलचक्कर से भुइयांडीह के लकड़ी टाल तक हो रही है, ताकि मानगो पुल पर ट्रकों-डंपरों को दिया जाने वाला वीवीआईपी ट्रीटमेंट बंद हो सके। यहां एक दर्जन ट्रकों-डंपरों को ठीक उसी तरह पार कराया जाता है, जैसे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, राज्यपाल आदि के गुजरने पर होता है। जब ये भारी वाहन गुजरते हैं, तो वहां मौजूद सफेद के साथ खाकी वर्दी धारियों के चेहरे पर तनाव साफ- साफ दिखता है।

कमल-दल में खलबली

चुनाव में जीत-हार तो लगी ही रहती है, इससे कार्यकर्ता हताश नहीं होते हैं, बल्कि दोगुने उत्साह से अगले लक्ष्य की ओर बढ़ जाते हैं। यह जुमला चुनाव परिणाम आने के बाद आपने अक्सर सुना होगा। खासकर हारने वाले दल के नेता और कार्यकर्ता इस जुमले को घुट्टी की तरह याद कर लेते हैं। लेकिन, फर्क तो पड़ता ही है। कार्यकर्ताओं का मनोबल भी खूब गिरता है, जिसे आप लोग अपने आसपास के कमल-दल वालों के चेहरे पर देख सकते हैं। ताजा खलबली, इस बात को लेकर मची है कि अब प्रदेश के बाद जिलों में भी पदाधिकारी बदले जाएंगे। प्रदेश अध्यक्ष को नेता प्रतिपक्ष बना दिया गया है, तो स्वाभाविक है कि पूर्णकालिक अध्यक्ष का नाम भी होली के बाद तय हो जाएगा। इसके बाद आएगी जिलों की बारी, तो लगे हाथ मंच-मोर्चा के पदाधिकारी भी बदले जाएंगे। इसके लिए सेटिंग-गेटिंग तेजी से हो रही है।

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