
जामताड़ा: झारखंड के जामताड़ा जिले में दुर्गापूजा की सदियों पुरानी परंपराएं आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं। नारायणपुर बाजार स्थित ऐतिहासिक गढ़ दुर्गा मंदिर में महाष्टमी के अवसर पर रविवार को भक्ति और श्रद्धा का अनूठा दृश्य देखने को मिला। सुबह पांच बजे से ही श्रद्धालु महतो अहरा तालाब में स्नान करने के बाद दंडवत प्रणाम करते हुए मां दुर्गा के दरबार पहुंचे। करीब 450 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में शामिल होकर भक्तों ने माता रानी की पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
तालाब में पवित्र स्नान कर दंडवत पहुंचे मंदिर तक
महाष्टमी पर मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो गई थी। भक्तों ने पहले महतो अहरा तालाब में पवित्र स्नान किया। इसके बाद दंडवत देते हुए मंदिर तक की यात्रा पूरी की। मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिए श्रद्धालु रास्ते में बार-बार जमीन पर लेटकर प्रणाम करते हुए आगे बढ़े। मंदिर पहुंचने के बाद उन्होंने माता रानी के चरणों में शीश नवाया और अपनी मनोकामनाएं रखीं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, सच्चे मन से मांगी गई मन्नत माता दुर्गा पूरी करती हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु मां को चुनरी, फल, फूल, प्रसाद और आभूषण अर्पित करते हैं। महाष्टमी के दिन मंदिर में उमड़ी भीड़ ने इस प्राचीन परंपरा के प्रति लोगों की गहरी आस्था को प्रदर्शित किया।
गढ़ दुर्गा मंदिर में मां को चढ़ाए गए 56 प्रकार के भोग
महाष्टमी के अवसर पर नारायणपुर के गढ़ दुर्गा मंदिर में वैष्णवी परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की विशेष पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान माता रानी को 56 प्रकार के भोग अर्पित किए गए। पूजा के बाद महाआरती हुई और श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। मंदिर परिसर में दिनभर धार्मिक वातावरण बना रहा। भक्तों ने मां दुर्गा से परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि और शांति की प्रार्थना की।
450 वर्ष पुराना है मंदिर का इतिहास
गढ़ दुर्गा मंदिर का इतिहास करीब 450 वर्ष पुराना बताया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, 16वीं सदी में राज परिवार की ओर से इस मंदिर की स्थापना की गई थी। यहां लंबे समय से वैष्णवी परंपरा के अनुसार पूजा होती आ रही है। पहले राजा-महाराजाओं की देखरेख में धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते थे। वर्तमान में राज परिवार के वंशजों के साथ नारायणपुर 16 आना के लोग भी पूजा के आयोजन में भाग लेते हैं। महानवमी और विजयादशमी के अवसर पर मंदिर परिसर में दो दिवसीय भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले में आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। मेले में विभिन्न धर्मों के लोगों की भागीदारी सामाजिक सद्भाव और आपसी भाईचारे का संदेश देती है।
जामताड़ा के गांवों में 250 से 500 साल पुरानी दुर्गापूजा
जामताड़ा जिले में नारायणपुर के अलावा कई अन्य स्थानों पर भी सदियों पुरानी दुर्गापूजा की परंपरा कायम है। नाला प्रखंड के नीचेपाड़ा हाटतला के समीप स्थित गढ़ेर मां दुर्गा मंदिर में करीब 491 वर्षों से पूजा होने की मान्यता है। मंदिर के शिलापट्ट पर वर्ष 1535 अंकित है। स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, राजा बुद्धदेव सिंह ने यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की शुरुआत की थी। आज भी उनके वंशज मंदिर की पूजा और देखरेख की जिम्मेदारी निभाते हैं।
छह पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपरा
इसी तरह फतेहपुर प्रखंड के मंझलाडीह गांव में करीब 450 वर्षों से मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। बताया जाता है कि यहां जमींदार आनंद सिंह ने पूजा की शुरुआत की थी। सिंह परिवार की छह पीढ़ियां इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। कभी महज 20 रुपये के खर्च में होने वाली पूजा का बजट अब बढ़कर करीब डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच गया है। यहां महासप्तमी के दिन नवपत्रिका को पालकी में सजाकर मंदिर तक लाने की विशेष परंपरा भी निभाई जाती है।
घाटी, मंडरो और पिंडारी में भी सदियों से हो रही दुर्गापूजा
जामताड़ा जिले के घाटी गांव में करीब 500 वर्षों से दुर्गापूजा होने की परंपरा बताई जाती है। वहीं मंडरो में लगभग 350 वर्ष, पिंडारी में 300 वर्ष और अमजोरा में करीब 250 वर्षों से मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। इन गांवों में आज भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना होती है।

