जमशेदपुर : झारखंड में हेमंत सोरेन मंत्रिमंडल के गठन का रास्ता अब साफ हो गया है। भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी मंत्री पद की दावेदारी नहीं करेगी। उन्होंने कहा, “सरकार की ओर से कोई प्रस्ताव नहीं मिला है, और चूंकि हमारी पार्टी के विधानसभा में केवल दो विधायक हैं, इसलिए मंत्री पद का सवाल नहीं उठता। लेकिन हम सरकार को हर कदम पर समर्थन देंगे।”

भविष्य में मंत्री पद पर विचार करेगा माले
दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा, “जब हमारी पार्टी के पास आठ-दस विधायक होंगे, तब मंत्री पद पर विचार किया जाएगा। वर्तमान में हमारी प्राथमिकता झारखंड की जनता के मुद्दों को सदन के अंदर और बाहर उठाना है।” उन्होंने इस बात पर खुशी जाहिर की कि माले के दो विधायक झारखंड विधानसभा में जनता की आवाज बनेंगे।
माले के फैसले से कांग्रेस को फायदा
माले के मंत्री पद छोड़ने के फैसले से कांग्रेस को बड़ा लाभ मिलता दिख रहा है। अब कांग्रेस कोटे से चार मंत्री बनने की संभावना है। इससे पहले पांच विधायकों पर एक मंत्री पद के फार्मूले के आधार पर कांग्रेस को तीन मंत्री पद मिलने की उम्मीद थी।
झामुमो-कांग्रेस-राजद का मंत्रिमंडल फार्मूला
हेमंत सोरेन के नेतृत्व में बनने वाले मंत्रिमंडल में झामुमो, कांग्रेस और राजद के बीच नए समीकरण उभर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार झामुमो को छह, कांग्रेस को चार और राजद को एक मंत्री पद मिलने की उम्मीद है। हालांकि, अंतिम नामों की घोषणा में अभी कुछ समय लग सकता है।
झामुमो की मांग और कांग्रेस का संतुलन
चुनाव में झामुमो को अधिक सीटें मिलने के आधार पर पार्टी ने अधिक मंत्री पद की मांग की थी। लेकिन भाकपा-माले के फैसले ने कांग्रेस के लिए जगह बनाई है। झामुमो और कांग्रेस के बीच संतुलन बनाए रखना हेमंत सोरेन के लिए अहम होगा।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
राजनीतिक विशेषज्ञ बताते हैं कि हेमंत मंत्रिमंडल का गठन न केवल झारखंड की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आने वाले समय में राज्य के सत्ता संतुलन को भी परिभाषित करेगा। भाकपा-माले के फैसले ने गठबंधन को मजबूती दी है, और अब देखना होगा कि अंतिम नामों में किन चेहरों को जगह मिलती है।

