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Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : ‘धूल और कांटे’

Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही में गहराई तक जड़ें जमाए रखने के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। सबसे ज्यादा इस बात का,कि हुजूर की शान में कोई गुस्ताखी न हो। जाने-अनजाने कोई गलती अगर नागवार गुजर गई तो पूरा माहौल बदल सकता है। किए-कराए पर पानी फिर सकता है। कुछ ऐसा ही हुआ है एक हाकिम के साथ, जानें क्या है पूरा माजरा द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से।

by Dr. Brajesh Mishra
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Jharkhand Bureaucracy : गुरु घर के थियेटर में बैठकर फिल्म का आनंद ले रहे थे। सेवादार ने बताया कि स्क्रीन पर ‘फूल और कांटे’ चल रही है। दिमाग में अचानक से एक सवाल कौंध गया। 26 में बैठकर गुरु 91 का मजा क्यों ले रहे? प्रश्न का उत्तर गुरु के पास ही हो सकता था। लिहाजा दबे पांव कमरे में प्रवेश कर गया। सामने फिल्म का क्लाइमेक्स चल रहा था। गुरु को आनंद के क्षण में व्यवधान बिल्कुल पसंद नहीं था। ऐसे में सह-दर्शक की भूमिका एकमात्र विकल्प थी।

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फिल्म खत्म होने के बाद गुरु मुखातिब हुए। पूछा- कैसी लगी? जवाब दिया- बहुत अच्छी गुरु। पूछा अचानक- फूल और कांटे? गुरु बोले- हां, धूल और कांटे से फूल और कांटे याद आ गया। सोचा देख लूं। बहुत दिन हो गए कोई मसाला फिल्म नहीं देखी। गुरु मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। शायद सामने से किसी जवाब की अपेक्षा थी। भाव समझकर उत्तर दिया, गुरु सारा रायता तो संसार में फैला है। फिल्मों में क्या तलाश करना? गुरु ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा- बिल्कुल सही कह रहे हो।

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काल के कपाल पर क्या लिखा है, यह कौन जानता है। अब देखो, पड़ोस में कितने नारे लगे थे- 25 से 30 बिहार में नीतीश! अचानक दिन बदले। अब दशकों की हनक किनारे लगती दिख रही है। अब इसे संयोग कहो या दुर्योग, कुछ ऐसा ही तुम्हारे अपने सूबे के नौकरशाही वाले मुहल्ले में भी हो रहा है। बिहार से सटे वनांचल के निकटवर्ती जिले से ताल्लुक रखने वाले सहनामधारी की कुंडली में भी ग्रह-गोचर ठीक नहीं लग रहे।

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गुरु धीरे-धीरे मूल विषय तक पहुंच चुके थे। बोले- सुना है कि जाने-अनजाने वनांचल वाले नीतीश से हुजूर की शान में गुस्ताखी हो गई है। किस्सा रोचक मोड़ ले रहा था। घटित को जानने की उत्कंठा प्रबल होती जा रही थी। धैर्यपूर्वक बस गुरु की बातों पर ध्यान देने की जरूरत थी। सो, उनकी ओर देखता रहा। गुरु बोले, कहानी छऊ वाले मुहल्ले की है। रिश्तेदार के विवाह में सम्मिलित होने मुखिया को उड़नखटोले से आना था। अब तुम तो जान ही रहे हो कि मौसम तेजी से बदल रहा है। धूल उड़नी शुरू हो गई है।

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उड़नखटोले के उतरने वाले स्थान पर बौछार नहीं की गई थी। जैसे ही उड़नखटोला पहुंचा, हवाओं ने विद्रोह कर दिया। चौतरफा धूल ही धूल। ऊपर वाले को नीचे कुछ नजर आना मुश्किल हो गया। जैसे-तैसे चौथे प्रयास में उड़नखटोला नीचे उतरा। हुजूर के साथ आए सहयात्री ने व्यवस्था की बड़ी लानत-मलानत की। खैर, बात आगे बढ़ी, प्रक्रिया विश्रामगृह पर मुखिया के स्वागत की ओर बढ़ी। असली खेला यहीं हो गया।

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स्वागत के लिए लाया गया गुलदस्ता बेवफा निकला। गुलदस्ते को सजाने के लिए लगाया गया स्टेपल मुखिया के हाथ में चुभ गया। बताने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि चुभन इतनी तेज थी कि लाल रक्त निकल आया। स्वागत के इंतजाम का यह आलम देख मौके पर मौजूद लोग बगलें झांकने लगे।

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कुछ लोगों ने फरमाया कि हुजूर ने ऐसी ही परेशानी से बचाने के लिए बुके की जगह बुक का नियम बनाया था। नौकरशाह कहां मानने वाले, जब तक प्लास्टिक के पेपर में लिपटा गुलदस्ता भेंट न कर दें, रात को राहत की नींद नहीं आती। बहरहाल, बताने वाले बता रहे कि हुजूर की रवानगी के बाद साहब को अनजाना डर सता रहा है।

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कहीं स्वागत में कमी भारी न पड़ जाए, रवानगी का फरमान न आ जाए। जिले से मुख्यालय के लिए कमान न कट जाए। आखिर सरकार की आमद… का मामला जो ठहरा। पूरा वाकया समझ में आ गया था। यह सोचते हुए गुरु घर से निकला कि आखिर ‘फूल और कांटे’ और ‘धूल और कांटे’ के बीच कौन सा अन्योन्याश्रित संबंध है।

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