
रांची :विजयादशमी का दिन… पूरे देश में उल्लास का समंदर हिलोरे मार रहा है। हर तरफ ढोल-नगाड़ों की थाप, ‘जय श्रीराम’ के गगनभेदी नारे और आकाश को चूमती आतिशबाजी का शोर सुनाई देता है। राजधानी रांची के ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान में राज्यपाल और रक्षा राज्य मंत्री संतोष गंगवार की मौजूदगी में सोने की लंका, कुंभकर्ण, मेघनाद और रावण के विशाल पुतलों को भस्म किया गया। बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश हवा में तैरने लगा। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के चेहरे दमक रहे थे। मोरहावादी में सबसे पहले सोने की लंका का दहन किया गया।
लेकिन, इसी भारत भूमि पर,इसी विजयादशमी के ठीक उलट एक ऐसी तस्वीर भी खींची जाती है जो हमें मुख्यधारा के उत्सवों से हटकर सोचने पर मजबूर कर देती है। झारखंड के ही गोड्डा जिले और बल्बड्डा जैसे इलाकों में, जहां एक तरफ उत्सव की धूम होती है, वहीं संताल आदिवासी समुदाय के भीतर एक गहरा सन्नाटा और उदासी छाई होती है। उनके लिए यह दिन खुशियों का नहीं, बल्कि अपने पूर्वज और इष्ट महिषासुर के वध का शोक मनाने का दिन होता है।
दो संस्कृतियों का महासंगम और परंपराओं का विरोधाभास
संताल समाज की यह परंपरा सदियों पुरानी है। दशमी के दिन जब हर कोई विजयादशमी की खुशियां मना रहा होता है, तब आदिवासी समाज के लोग पारंपरिक सैन्य वेश-भूषा में सजे-धजे होकर सैकड़ों साल पुराने दुर्गा पूजा पंडालों की ओर रुख करते हैं। उनका यह सफर केवल घूमने या मेला देखने का नहीं होता, बल्कि एक अनोखा और शांतिपूर्ण सांकेतिक विरोध दर्ज कराने का होता है।

इन पंडालों में पहुंचकर आदिवासी मंडलियां एक ही सवाल बार-बार दोहराती हैं-‘बोलो बोलो मेरा महिसा कहां है?’ वे महिषासुर को कोई राक्षस नहीं, बल्कि अपना गौरवशाली पूर्वज ‘महिषा सोरेन’ मानते हैं। उनका अटूट विश्वास है कि उनके इष्ट को छल के सहारे हराया और मारा गया था। यही वजह है कि वे हर साल इस दिन पंडालों में पहुंचकर अपना विरोध दर्ज करते हैं, जो इस बात का जीवंत प्रमाण है कि एक ही भौगोलिक सीमा के भीतर हमारी सांस्कृतिक मान्यताएं और इतिहास के देखने के नजरिए कितने भिन्न हो सकते हैं।
संवाद और मेल-मिलाप का अनूठा तरीका
हालांकि, इस सांकेतिक विरोध में कोई हिंसा या कड़वाहट नहीं होती, बल्कि यह लोक परंपरा और आपसी तालमेल का एक अद्भुत उदाहरण है। जब आदिवासी टोली पूजा पंडालों में पहुंचती है, तो वहां के प्रधान पुजारी (जैसे बल्बड्डा के 150 साल पुराने पंडाल के मनकी बाबा) उन्हें बड़े प्रेम से समझाते हैं। पुजारियों की ओर से उन्हें सांत्वना दी जाती है कि यह वध नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग था। इसके बाद पुजारियों द्वारा आदिवासियों को शीतल जल और तुलसी का प्रसाद दिया जाता है।
प्रसाद ग्रहण करने के बाद यह विरोध शांत हो जाता है और वे उदासी धीरे-धीरे आपसी सौहार्द में बदल जाती है। इसके बाद यही आदिवासी टोली मेले का हिस्सा बनती है। मेला प्रबंधन भी इस परंपरा का पूरा सम्मान करता है। आदिवासियों की इस मंडली को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है, उन्हें सम्मानित किया जाता है और पुरस्कृत भी किया जाता है।
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