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Jitanram Manjhi : पहले नाराजगी, अब पूर्ण समर्पण : जीतनराम मांझी की रणनीति क्या है

by Rakesh Pandey
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पटना : बिहार विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं। जैसे-जैसे चुनाव का समय नजदीक आ रहा है, राज्य की राजनीति में हलचल बढ़ती जा रही है। खासकर, जीतनराम मांझी के हालिया बयानों ने सियासी तापमान को और गर्म कर दिया है। पहले उन्होंने केंद्र सरकार और एनडीए गठबंधन से नाराजगी जताई थी, लेकिन अब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपनी पूरी निष्ठा और समर्थन का एलान किया है। मांझी के इस बदलते रुख को लेकर राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या ये महज बयानबाजी है या इसके पीछे कोई बड़ी रणनीति छिपी हुई है।

मांझी का बयान : नाराजगी से समर्पण तक का सफर

कुछ दिन पहले ही बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने मुंगेर और जहानाबाद में एनडीए के खिलाफ नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर उनकी पार्टी को पर्याप्त सीटें नहीं मिलतीं, तो वे कैबिनेट से इस्तीफा देने तक का विचार कर सकते हैं। खासतौर पर मुंगेर में मांझी ने झारखंड और दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी को एक भी सीट न मिलने पर अपनी असहमति जताई थी। उन्होंने सवाल उठाया था कि उनका वजूद क्या अब किसी को दिखाई नहीं देता।

इसके बाद, जैसे ही राजनीतिक पारे में उबाल आया, मांझी ने अपनी नाराजगी को शांत करते हुए कहा कि वह प्रधानमंत्री मोदी के प्रति पूर्ण समर्पण का इरादा रखते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह एनडीए के साथ मजबूती से खड़े रहेंगे और बिहार चुनाव में पूरी ताकत से भाग लेंगे।

मांझी की रणनीति : चार अहम पहलू

बिहार चुनाव के लिए सीटों की दावेदारी

जीतनराम मांझी की पार्टी चुनाव में 40 सीटों पर दावेदारी कर रही है, जो बिहार के सियासी समीकरण में बहुत बड़ी बात है। लेकिन, बिहार में बीजेपी और जेडीयू जैसी बड़ी पार्टियों के दबदबे के कारण इतनी सीटें मिल पाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में, मांझी के बयान को एक राजनीतिक दबाव के तौर पर भी देखा जा सकता है, जिसका उद्देश्य अपने लिए ज्यादा सीटों की मांग रखना हो सकता है। उनका यह बयान एक तरह से गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर उनके हक को सुनिश्चित करने की कोशिश भी हो सकती है।

चिराग पासवान का बढ़ता प्रभाव

बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण अहम भूमिका निभाते हैं और यही कारण हो सकता है कि मांझी के तेवर बदलने के पीछे चिराग पासवान का बढ़ता प्रभाव भी हो। चिराग पासवान और जीतनराम मांझी दोनों ही दलित राजनीति के बड़े चेहरे हैं। बिहार में दलित वोटबैंक का एक बड़ा हिस्सा पासवान और मुसहर जातियों में बंटा हुआ है। चिराग पासवान की बढ़ती ताकत मांझी के लिए चिंता का कारण हो सकती है, क्योंकि इन दोनों की राजनीति का आधार एक ही वर्ग है। ऐसे में चिराग के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए मांझी ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए समर्पण का दिखावा किया है।

राजनीतिक संतुलन बनाए रखना

जीतनराम मांझी की राजनीति का केंद्र हमेशा बिहार रहा है। उनका यह बयान इस बात को साबित करता है कि वे न केवल केंद्रीय राजनीति में अपनी अहमियत बनाए रखना चाहते हैं, बल्कि राज्य में भी अपनी सियासी ताकत को महसूस कराना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि बिहार के विकास के लिए उन्हें और उनकी पार्टी को ज्यादा मौके मिलें और इसके लिए वे एनडीए से ज्यादा सीटें पाने की कोशिश कर रहे हैं।

एनडीए के भीतर रिश्तों का संतुलन

मांझी का यह बयान यह भी दर्शाता है कि वह बीजेपी और नीतीश कुमार के बीच के रिश्तों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि उन्होंने नाराजगी जाहिर की, लेकिन अंततः उन्होंने यह साफ कर दिया कि उनका रुख पूरी तरह से एनडीए के पक्ष में है। यह उनकी कूटनीति हो सकती है, जिससे वे दोनों पक्षों के बीच अपनी सियासी स्थिति मजबूत कर रहे हैं।

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