
रांची :झारखंड सरकार ने जेपीएससी और सीजीएल समेत चार प्रमुख परीक्षाओं को रद्द करने के अपने फैसले का हाई कोर्ट में पुरजोर बचाव किया है। सरकार ने अदालत में हलफनामा पेश कर साफ कहा कि जब परीक्षा आयोजित कराने वाली संस्था ही भ्रष्टाचार के दलदल में डूब चुकी हो, तो उसमें से धांधली करने वालों और ईमानदार छात्रों को अलग-अलग छांटना पूरी तरह असंभव है। 18 अगस्त 2026 को कैबिनेट द्वारा लिया गया परीक्षा रद्द करने का फैसला पूरी तरह संवैधानिक और लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य को बचाने के लिए जरूरी कदम था।
पूरे सिंडिकेट का था परीक्षा प्रणाली पर कब्जा
सीआईडी जांच से इस परीक्षा घोटाले की एक ऐसी खौफनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में पता चला है कि यह कुछ लोगों द्वारा की गई सामान्य सी गड़बड़ी नहीं थी, बल्कि पूरे सिंडिकेट का परीक्षा प्रणाली पर कब्जा था। डिप्टी कलेक्टर जैसे बड़े पदों की बोलियां लगीं और इन्हें 50 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपये तक में बेचा गया।
इस फर्जीवाड़े को अंजाम देने के लिए देश-विदेश में बाकायदा ‘ट्रेनिंग कैंप’ चलाए गए थे। परीक्षा से ठीक पहले उत्तर रटाने के लिए अभ्यर्थियों को संगठित रूप से इकट्ठा किया गया।
नेपाल व देश के कई राज्यों का कनेक्शन
28 अभ्यर्थियों को सीमा पार नेपाल के बीरगंज ले जाया गया, जहां उनसे केवल उत्तर याद करवाए गए। हैरानी की बात यह है कि इनमें से 10 अभ्यर्थी पास भी घोषित कर दिए गए थे। बिहार, कोलकाता, आसनसोल, झरिया और बोकारो में भी ऐसे ही विशेष केंद्र बनाकर जवाब याद कराए गए। जांच एजेंसी सीआईडी ने अब तक इस मामले में 28 आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा है, जबकि 265 सफल अभ्यर्थियों को संदेह के दायरे में रखते हुए नोटिस थमाया गया है।
जांच में खुलासा हुआ कि पूरी प्रक्रिया में नियमों को धता बताकर मेसर्स टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्रालि नाम की कंपनी को बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के काम सौंप दिया गया था। इसके बाद धांधली की सारी सीमाएं पार कर दी गईं।
भ्रष्टाचार के कैसे – कैसे कारनामें
अभ्यर्थियों की ओएमआर शीट बिना सील किए रखी गई थीं। सर्वर और ऑन-स्क्रीन मार्किंग के जरिए नंबरों में हेरफेर किया गया। इंटरव्यू में मनचाहे अभ्यर्थियों को फायदा पहुंचाने के लिए विशेष कोडिंग की गई और व्हाट्सएप पर उत्तर बांटे गए। साक्ष्य छिपाने के लिए आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष ने अपना लैपटॉप तक नष्ट कर दिया। हालांकि, बाद में सीआईडी ने तत्कालीन अध्यक्ष, परीक्षा नियंत्रक और एजेंसी निदेशकों को गिरफ्तार कर लिया।
कोर्ट में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक मामलों (वंशिका यादव और सचिन कुमार) की मिसाल देते हुए कहा कि जब धोखाधड़ी का दायरा इतना बड़ा हो, तो पूरी परीक्षा रद्द करना ही एकमात्र सही रास्ता बचता है। याचिकाकर्ताओं की इस दलील को भी खारिज कर दिया गया कि उन्हें व्यक्तिगत नोटिस नहीं दिया गया। सरकार का स्पष्ट रुख है कि भ्रष्टाचार की नींव पर हासिल की गई कोई भी नौकरी या नियुक्ति पत्र किसी को गैर-कानूनी तरीके से पद पर बने रहने का अधिकार नहीं देता।
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