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Khunti Makar Sankranti : मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति की आत्मा है, सामाजिक एकता का पर्व : नीलकंठ सिंह मुंडा

Jharkhand Hindi News : दही-चूड़ा भोज में जिले के कई प्रमुख नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य नागरिक शामिल हुए

by Rakesh Pandey
Khunti Makar Sankranti
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खूंटी : मकर संक्रांति का पर्व भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण है। इस पर्व के माध्यम से न केवल ऋतु परिवर्तन का स्वागत किया जाता है, बल्कि समाज को जोड़ने वाली सदियों पुरानी परंपराओं को भी सहेजा जाता है। इसी भाव के साथ झारखंड के खूंटी जिले में मकर संक्रांति के अवसर पर पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा के लेविन बागान स्थित आवास पर पारंपरिक दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया गया। इस आयोजन में राजनीतिक, सामाजिक और आमजन की उल्लेखनीय भागीदारी देखने को मिली, जिससे पर्व की सामूहिक भावना और सांस्कृतिक महत्व और अधिक सशक्त होकर सामने आयी।

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Khunti Makar Sankranti News: दही-चूड़ा भोज में दिखी सामाजिक एकता

बुधवार को आयोजित इस भोज में जिले के कई प्रमुख नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य नागरिक शामिल हुए। कार्यक्रम में भाजपा के जिलाध्यक्ष आनंद कुमार, पूर्व जिलाध्यक्ष काशीनाथ महतो, जिला महामंत्री निखिल कंडुलना, रूपेश जायसवाल सहित पार्टी के वरिष्ठ नेता, कार्यकर्ता और स्थानीय नागरिक मौजूद रहे। सभी अतिथियों ने एक-दूसरे को मकर संक्रांति की शुभकामनाएं दीं और पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लिया। आयोजन स्थल पर आत्मीयता, उत्साह और सौहार्दपूर्ण वातावरण स्पष्ट रूप से देखने को मिला।

पर्व नहीं, परंपरा का प्रतीक

इस अवसर पर पूर्व मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा ने उपस्थित लोगों का स्वागत करते हुए कहा कि मकर संक्रांति केवल एक पर्व भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि दही-चूड़ा भोज की परंपरा झारखंड, बिहार और पूर्वी भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है। यह परंपरा सामाजिक भेदभाव को मिटाकर सभी को एक साथ बैठने और संवाद करने का अवसर प्रदान करती है। उनके अनुसार, ऐसे आयोजन समाज में आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करते हैं।

सकारात्मक ऊर्जा का संदेश

भाजपा जिलाध्यक्ष आनंद कुमार ने भी मकर संक्रांति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व नई ऊर्जा, नई शुरुआत और सकारात्मक सोच का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक और सामाजिक व्यस्तताओं के बीच इस तरह के पारंपरिक आयोजन कार्यकर्ताओं और समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाते हैं। इससे आपसी संवाद बढ़ता है और संगठनात्मक मजबूती के साथ-साथ सामाजिक जुड़ाव भी सुदृढ़ होता है।

परंपरा से जुड़ता समाज

कार्यक्रम के दौरान यह भी देखा गया कि दही–चूड़ा भोज केवल भोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता का प्रतीक बनकर उभरा। पारंपरिक व्यंजनों के साथ लोगों ने एक-दूसरे से विचार साझा किए और पर्व की शुभकामनाओं के माध्यम से आपसी रिश्तों को और मजबूत किया। स्थानीय लोगों का कहना था कि इस तरह के आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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