VIVEK SHARMA
RANCHI: परिवार को संभालने के साथ महिलाएं अब पुरुषों के कदम से कदम मिलाकर चल रही है। घर हो, ऑफिस हो, मार्केटिंग कहीं भी वे पुरुषों से पीछे नहीं है। लेकिन बात फैमिली प्लानिंग की हो तो पुरुष उनसे काफी पीछे है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल मात्र 44 पुरुषों ने नसबंदी करने में इंटरेस्ट दिखाया। जबकि इस दौरान 2,845 महिलाओं ने नसबंदी कराई। जिससे साफ है कि आज भी फैमिली प्लानिंग की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर है। पुरुष अब भी फैमिली प्लानिंग के लिए महिलाओं को ही आगे बढ़ा दे रहे हैं। बता दें कि फैमिली प्लानिंग को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य विभाग करोड़ों रुपए भी खर्च कर रहा है। वहीं उत्प्रेरक को भी सम्मान राशि दी जा रही है। इसके बावजूद पुरुष इंटरेस्ट नहीं दिखा रहे हैं।
जागरूकता की कमी से नहीं आ रहे पुरुष
सिविल सर्जन डॉ प्रभात कुमार ने बताया कि पुरुष नसबंदी को लेकर समाज में फैली भ्रांतियां, जागरूकता की कमी और सामाजिक कलंक इसकी कम पार्टिसिपेशन के प्रमुख कारण हैं। कई पुरुष अब भी यह मानते हैं कि वासेक्टॉमी से शारीरिक क्षमता या लाइफस्टाइल प्रभावित होती है। जबकि मेडिकल एक्सपर्ट्स बताते हैं कि यह एक सुरक्षित, सरल और कम समय में होने वाली प्रक्रिया है। जिससे व्यक्ति जल्द सामान्य जीवन में लौट सकता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि पुरुष नसबंदी, महिला नसबंदी की तुलना में कहीं अधिक आसान और कम जटिल प्रक्रिया है। जिसमें केवल मामूली सर्जरी की जरूरत होती है। इसके बावजूद सामाजिक मिथक और झिझक पुरुषों को इस विकल्प को अपनाने से रोक रहे हैं।
महिलाओं पर ही नसबंदी का दबाव
पिछले वर्षों के आंकड़े भी ये दिखाते हैं कि कैसे पुरुष महिलाओं से पीछे हैं। 2022-23 में 216 पुरुष नसबंदी के मुकाबले 4,803 महिला नसबंदी के मामले सामने आए थे। वहीं 2023-24 में पुरुष नसबंदी के मामलों में हल्की वृद्धि होकर संख्या 269 तक पहुंची, लेकिन महिला नसबंदी के मामले बढ़कर 5,317 हो गए। सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि मामूली बढ़ोतरी के बावजूद परिवार नियोजन की स्थाई जिम्मेदारी का बोझ अब भी मुख्य रूप से महिलाओं पर ही है। चूंकि परिवार भी दबाव अपने घर के पुरुषों की बजाय महिलाओं पर ही बनाता है।
सरकार दे रही प्रोत्साहन राशि
पुरुष भागीदारी बढ़ाने के लिए सरकार आर्थिक प्रोत्साहन भी प्रदान कर रही है। वासेक्टॉमी करवाने वाले पुरुषों को 3,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाती है, जबकि महिला नसबंदी पर 2,000 रुपये मिलते हैं। प्रसव के सात दिनों के भीतर नसबंदी कराने वाली महिलाओं को 3,000 रुपये तक की राशि मिलती है। इसके बावजूद पुरुष नसबंदी को लेकर प्रतिक्रिया बेहद सीमित बनी हुई है। वहीं स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने कहा कि जागरूकता अभियान, मिथकों को दूर करने और सामाजिक सोच में बदलाव के जरिए ही पुरुषों की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है। जिससे फैमिली प्लानिंग में संतुलित जिम्मेदारी सुनिश्चित हो सके।

