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मुहर्रम का महीना शुरू, यौम-ए-आशूरा, निकलेगी ताजिया व मातमी जुलूस, जानिए इसका इतिहास

by Rakesh Pandey
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स्टेट डेस्क, रांची: इस साल मुहर्रम के पवित्र महीने की शुरुआत गुरुवार 20 जुलाई 2023 से हो गयी है। मुहर्रम की दसवीं तारीख को यौम-ए-आशूरा मनाया जाएगा, जिसकी तारीख 29 जुलाई है। मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना होता है और मुहर्रम के साथ ही इस्लामिक साल की शुरुआत हो जाती है। मुहर्रम के महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग और खासतौर पर शिया मुसलमान पैगंबर मोहम्मद के नवासे की शहादत का गम मनाते हैं। इस दौरान ताजिए भी निकाली जाती है। आइए जानते हैं मुहर्रम के इस पवित्र महीने के बारे में…..

इस लिए मनाया जाता है मुहर्रम:

कहा जाता है कि सन 61 हिजरी (680वीं) में इराक के कर्बला में पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुस्सैन समेत उनके 72 साथी शहीद हो गए थे। यह जंग इराक के कर्बला में यजीद की सेना और हजरत इमाम हुसैन के बीच हुई थी। इस जंग में इमाम हुसैन ने इस्लाम की रक्षा के अपने 72 साथियों के सा​थ शहादत दी थी। इमाम हुसैन और उनके साथियों के शहादत के गम में ही मुहर्रम मनाया जाता है। इसलिए मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए मुहर्रम का महीना गम का महीना होता है।

जानिए यौम-ए-आशूरा कब है और क्या है इसका महत्व

यौम-ए-आशूरा मुहर्रम के दसवें दिन को मनाया जाता है। इस साल यौम-ए-आशूरा 29 जुलाई 2023 को होगी। यह मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए मातम का दिन होता है। क्योंकि इसी दिन करीब 1400 साल पहले पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत हुई थी। शिया समुदाय के लोग मुहर्रम की पहली तारीख से नौंवी तारीख तक रोजा रखते हैं। वहीं सुन्नी समुदाय के लोग मुहर्रम के नौंवी और दसवीं तारीख को रोजा रखते हैं। यौम-ए-आशूरा के दिन लोग काले कपड़े पहनते हैं और मातम मनाते हैं। शहरों के इमामबाड़े से ताजिए का जुलूस निकाला जाता है।

इस्लाम धर्म की रक्षा के लिए शहीद हुए थे हजरत इमाम हुसैन

मुस्लिम समुदाय के लोगों का मुहर्रम दूसरा पवित्र महिना होने के साथ ही दुख का भी दिन होता है। हजरत इमाम हुसैन इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे थे । यौम- ए-आशूरा मोहर्रम के दसवें दिन को मातम का दिन कहा जाता है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार आज से 14 सौ साल पहले हजरत इमाम हुसैन शहीद हुए थे। उन्होंने इस्लाम की रक्षा कि लिए 72 साथियों के साथ शहादत दी थी। उनकी शहादत वर्तमान के इराक के कर्बला में हुसैन की सेना और यजीद की सेना के बीच लड़ाई हुई थी।

-क्या है ताजिया का इतिहास?

मुहर्रम के दौरान इस्लामिक धर्मावलंबियों द्वारा मातम मनाने के क्रम में ताजिया निकाला जाता हैं। जिसमें काफी संख्या में लोग ताजिया के साथ-साथ चलते हैं। ताजिया निकालने की शुरुआत हजरत इमाम हुसैन की सेना और यजीद की सेना के बीच लड़ाई हुई थी। उस समय से ही यह निकाली जाती है। विशेष रूप से इस्लाम धर्म के शिया समुदाय के लोग ताजिया निकालते हैं। जत्थे के साथ चलने वाले लोग काला कपड़ा पहने होते हैं।

-या हुसैन हम ना हुए हैं के लगाते है नारे

ताजिया के साथ मातम मनाने के लिए जत्थे में शामिल लोग जोर-जोर से हुसैन हम ना हुए हैं ..के नारे लगाते हैं। इसका मतलब यह होता है कि हजरत इमाम हुसैन हम सभी आपके शहीद होने पर दुःखी है। साथ ही इसका मतलब यह भी होता है कि कर्बला में इस्लाम की रक्षा करते हुए हम भी आपके साथ शहादत देते। इस तरह से लोग हजरत इमाम हुसैन के शहादत पर मातम मनाते हैं।

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