‘राजनीति में सफल होने के बावजूद वो कहते है मैं राजनीति को अच्छे से नहीं समझता हूं। मेरी सबसे बड़ी ताकत ध्यान से सुनना और व्यवहारिक बुद्धि है। मैं ऐसा काम करना चाहता हूं, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना न हो।’

ऐसा कहना था प्रशांत किशोर (PK) का, जिन्होंने अपनी नई राजनीतिक पार्टी ‘जन सुराज पार्टी’ ऑफिशियली लांच कर दी है। साल 2014 में हर गली-कूचे में मोदी की लहर बनाने वाले प्रशांत किशोर ने अब तक 9 पार्टियों के लिए राजनीतिक रणनीति बनाई है, जिनमें से 8 में उन्होंने जीत दिलाई है। 2014 में वे बीजेपी के साथ-साथ अपना भी एक ब्रांड बना रहे थे। लोग कहते है कि वे पार्टी ही देख-परख कर चुनते है यानी जिसकी जीतने की गुंजाइश हो, उसी के लिए काम करते हैं या फिर वे खुद ही हरफनमौला हैं।
एकमात्र हथियार फोन
अखबार, टीवी समाचार, ईमेल व लैपटॉप इत्यादि का प्रयोग वे नहीं करते हैं। उनका एकमात्र हथियार उनका फोन है। चुनाव जीतने औऱ लोगों के मन को पढ़कर चुनावी बयार को पार्टी के पक्ष में करना उनका हुनर है। बिहार के रोहतास जिले से ताल्लुक रखने वाले प्रशांत किशोर का मन पढ़ाई के अलावा सभी कामों में लगता। चूंकि पिता पेशे से डॉक्टर थे, तो पढ़ना अनिवार्य था। दिमाग तेज होने के कारण कम पढ़कर भी बढ़िया कर जाते थे। एक इंटरव्यू में प्रशांत कहते हैं कि पिता श्रीकांत पांडे सरकारी डॉक्टर थे, तो जहां उनकी पोस्टिंग होती, वहीं चले जाते। इस तरह पढ़ाई सरकारी स्कूल से हुई। फिर पटना के साइंस कॉलेज से और फिर हिंदू कॉलेज। तबीयत खराब होने के कारण दिल्ली से वापस लौटना पड़ा और ग्रेजुएशन लखनऊ से पूरी हुई। बीच-बीच में पढ़ाई छूटती और फिर शुरू करते हुए प्रशांत किशोर ने ग्रेजुएशन कर ली।
जब मोदी ने कहा साथ मिलकर काम करते है
एक आर्टिकल में प्रशांत ने मोदी के संबंध में लिखते हुए बताया था कि ‘जब वे यूएन में कार्यरत थे, तो मालन्यूट्रीशन पर एक आर्टिकल लिखा था, जिसमें गुजरात सबसे निचले पायदान पर था। तब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उनके ऑफिस से फोन आया और कहा गया कि बोलने से बेहतर है, मिलकर काम करते है’। तब उनके लिए फैसला बहुत ही मुश्किल था, क्योंकि तब वे संयुक्त राष्ट्र में बहुत अच्छी सैलरी पर काम कर रहे थे। यूएन छोड़ भारत वापसी के लिए उन्होंने नरेंद्र मोदी से शर्त रखी कि मैं सीधा आपसे बात करूंगा, बीच में कोई नहीं। मोदी मान गए और प्रशांत भारत लौट आए। इसके बाद से ही बीजेपी के लिए काम करने लगे।
पत्नी भी पेशे से डॉक्टर
प्रशांत की पत्नी जाह्नवी दास भी पेशे से डॉक्टर हैं। प्रशांत की मुलाकात जाह्नवी से यूएन के ही एक हेल्थ प्रोग्राम के दौरान हुई थी। यहीं दोनों ने दोस्ती, प्यार और फिर शादी तक का सफर तय किया। उनका एक बेटा भी है। जाह्नवी डॉक्टरी छोड़ बिहार में ही बेटे के साथ रहती हैं। प्रशांत के माता-पिता अब जीवित नहीं हैं। भाई-बहन सब दिल्ली में ही रहते हैं।
जहां हाथ रखा, वहीं सफलता मिली
2011 में बीजेपी, गुजरात के लिए उन्होंने काम किया। फिर 2014 के आम चुनाव में पॉलिटिकल एडवाइजर बनकर उभरे और मल्टीपल स्ट्रेटजी के साथ सोशल मीडिया का चुनाव में सटीक इस्तेमाल कर प्रशांत किशोर ने मोदी को हर घर का चेहरा बना दिया। इसके बाद 2015 में उन्होंने इंडियन पॉलिटिक्ल एक्शन समेटी बनाई। 2015 में उन्होंने नीतीश कुमार के लिए इलेक्शन कैंपेन किया। 2016 में प्रशांत ने कांग्रेस के लिए पंजाब विधानसभा चुनाव में रणनीति बनाई औऱ कांग्रेस दो चुनाव हारने के बाद 2017 में उनकी रणनीतियों के कारण वापस आई। इसके बाद 2017 में जगनमोहन रेड्डी के लिए, 175 में से 151 सीटों पर जीत दिलवाई। इसके बाद 2020 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 70 में से 62 सीटों पर विजयी बनाया। 2021 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार को 294 में से 213 सीटें दिलाकर भारी जीत दिलाई। इसी साल उन्होंने तमिलनाडु में डीएमके के लिए काम किया और राज्य में पहली बार 159 सीटों के साथ एम के स्टालिन मुख्यमंत्री बने।
फिल्मों के ऑफर ठुकरा दिए
प्रशांत किशोर के पास उनके जीवन पर फिल्म बनाने के लिए नेटफ्लिक्स, डिज्नी और शाहरुख खान तक का ऑफर आया, लेकिन उन्होंने सभी को इंकार कर दिया। समर्थक कहते हैं कि वे जहां हाथ रख दें, वहीं सफलता मिल जाती है। वे खुद मानते हैं कि नई पार्टी बनाने की बात करना आसान है, पर बनाना मुश्किल। अगले साल बिहार में चुनाव है औऱ उन्होंने अपनी नई पार्टी जन सुराज पार्टी को जनता के सामने कर दिया है। इसके लिए वे इसी नाम से यानी जन सुराज अभियान के नाम से बीते दो वर्षों से बिहार में पदयात्राएं कर रहे हैं। अर्थात् चुनाव से बहुत पहले ही उनकी पार्टी और उनका नाम घर-घर पहुंच रहा है। अपने काम को ही अपने जीवन का सब कुछ मानने वाले प्रशांत किशोर जब किसी पार्टी के लिए चुनावी रणनीति तैयार करते हैं, तब एक वक्त में 4000 लोग तक उनके लिए काम करते हैं। ऐसे में उन्होंने दावा किया है कि उनकी पार्टी 1 करोड़ लोगों की पार्टी है।
जब उनकी टीम ने 40 हजार गांवों तक पहुंची
चुनाव, चुनावी रणनीति और जनता के बीच समतल पाट बनाने वाले प्रशांत किशोर कहते हैं, अब चुनावी खर्च बहुत बढ़ गया है, इसलिए राजनीति में प्रवेश आसान नहीं है। भारत में लोगों का ध्रुवीकरण हो रहा है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में 80 करोड़ से अधिक मतदाता हैं। लोगों को सुनने की तकनीक विकसित कर वे नई जानकारी एकत्रित करते हैं यानी जनता का मन टटोलते हैं और उसे अपनी रणनीति का हिस्सा बनाते हैं। इसका एक नमूना यह भी है कि 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी टीम 40 हजार गांवों तक पहुंची थी, ताकि वे जनता की समस्याओं का पता लगा सकें। इस दौरान बिहार में जन्मे प्रशांत को पता चला कि बिहार में सबसे बड़ा विवाद नाली को लेकर है। थाने में भी हर पांचवीं शिकायत नाली विवाद को लेकर है। इसके बाद बंगाल चुनाव में उन्होंने हेल्प लाइन नंबर शुरू किया, जहां लोग कॉल करके अपनी शिकायतें दर्ज कर सकते थे। इस हेल्प लाइन पर 70 लाख लोगों ने कॉल किया। यहां उन्हें पता चला कि लोग ज्यादातर शिकायतें जाति प्रमाण पत्र व अन्य प्रकार के प्रमाण पत्र बनने और इनसे जुड़े भ्रष्टाचार से परेशान हैं। इस पर काम करते हुए सरकार ने 6 सप्ताह में 26 लाख प्रमाण पत्र जारी किए।
अबकी बार, अपनी बारी
ऐसे में जनता की नजर उनकी खुद के लिए बनाए जाने वाले चुनावी रणनीतियों पर रहेगी। जब वे अन्य पार्टियों को जीत दिलाने के लिए तमाम दांव-पेंच लगा सकते हैं, तो अपनी पार्टी के लिए किस तरह की तैयारियां करेंगे। ये बातें आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में ही स्पष्ट हो पाएंगी।
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